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नंगी टांगो का नशा

राजनेताओं और अरबपति बाबाओं से 
विवेक की अपेक्षा रखने वाले 
मूढ़ श्रोताओं-पाठकों के नाम




धन के मद में चूर हैं मंत्री-संत्री-संत.
इसीलिए आतंक का नहीं दीखता अंत..

जनता बेचारी मरी सत्ता बे-अफ़सोस.
सिद्ध हो गया देख लो समरथ को नहि दोस..

फैशन शो चलता रहा, मंत्री जी मद - मस्त.
नंगी टांगो का नशा बुद्धि करता ध्वस्त..


नेता गति बखानते, जनता हाहाकार..
मुंबई हाय इत्ती बड़ी, और धमाके चार. ?

सत्ता कहती क्या हुआ..हुए अगर विस्फोट.
ये तो दुनिया का चलन, इस में क्या है खोट..
--योगेन्द्र मौदगिल 





सत्ताधारी लोमड़ी, सत्ता-मद में चूर...

शेर सभी सोये पड़े, बिदक रहे लंगूर..
सत्ताधारी लोमड़ी, सत्ता-मद में चूर...

धीरे-धीरे बढ गया, इनका-उनका रोग..
बाबा का हठ-योग तो, सरकारी लठ-योग...

बूढी आज़ादी इधर, रही मनाती सोग..
और उधर पिटते रहे, हाय निहत्थे लोग...

दिग्गी भी सठिया गए, चिंतित है सरकार..
राजघाट को कर दिया, सुषमा ने गुलज़ार...

बुरे वक़्त के सामने कुंद हुए हथियार.
कांग्रेस को जूता मिला , बाबा को सलवार..

शासन तो अँधा हुआ, बहरी है सरकार..
बदला अपना वक़्त पर, जनता लेगी यार...

आना, इक दिन आओगे, क्या ले लोगे वोट..
चुभती बहुत है धूप में, अँधेरे की चोट....

आम आदमी के लिए ना दिन है ना रात..
पर बाबा को दीखता कालाधन दिन-रात..

बेच-बेच कर योग को किये करोड़ों पार..
तेरी लीला को लखूं या देखूं सरकार..

इधर भी भ्रष्टाचार है, उधर भी भ्रष्टाचार.
तू भी साहूकार है, वो भी साहूकार..

सब झोटों के बीच में, बछड़े रहे पुकार.
इधर सभी कस्साब तो, उधर भी मारामार.
** योगेन्द्र मौदगिल


एक दोहा ...................

14 मार्च है आज.
एकदम फुर्सत में हूँ.
न कोई कवि सम्मेलन न गोष्ठी.
जरूरी भी था क्योंकि जाट आरक्षण समर्थकों के
धरने के कारण रेल मार्ग अवरुद्ध थे
कहीं बस तो कहीं रेल..अपन पानीपत कल रात
ही पहुँच गए थे.....

खैर
१० मार्च को बरेली में
कुमार विश्वास (गाज़ियाबाद) सुरेन्द्र शर्मा (दिल्ली),
योगेन्द्र मोदगिल (पानीपत), कमलेश मृदु (सीतापुर) ,
अर्जुन सिसोदिया (गुलावठी), नेहा भारद्वाज (बदायू),
व्यंजना शुक्ल (लखनऊ), राजेश गौड़ व्
कमल सक्सेना बरेली उपस्थित रहे.....

ब्लागर दयानिधि वत्स जी
से होटल में ही मुलाकात हो गई थी पर
हम देरी से पहुंचे थे सो कोई सार्थक बातचीत नहीं हो सकी..
वो कार्यक्रम स्थल तक पहुंचे या नहीं
ये मुझे अभी तक नहीं पता क्योंकि
तब से अब तक उनसे कोई बात नहीं हो सकी...

११ मार्च को भारत इंजीनियरिंग कालेज मोहना में
डाक्टर शम्भू सिंह मनहर (खरगोन), डाक्टर अशोक बत्रा (सोनीपत), डाक्टर गजराज कोशिक (गोहाना), कमल सक्सेना (बरेली),
योगेन्द्र मोदगिल (पानीपत), अशोक शर्मा (दिल्ली),
कीर्ति माथुर (अलीगढ) व् शशिप्रभा जी उपस्थित रही..

१२ मार्च के कार्यक्रम हरदोई  में
रमेश शर्मा (चित्तोडगढ), शशिकांत यादव (देवास),
योगेन्द्र मोदगिल (पानीपत), संजय शुक्ल (कोटा),
उमेश उत्साही (जयपुर), सबरस मुरसानी (भरतपुर),
कमल सक्सेना (बरेली), राधेशाम भारती (इलाहबाद),
देवेश तिवारी (दिल्ली), अनु सपन (भोपाल) और
दादा वेदव्रत बाजपेई (लखनऊ) उपस्थित रहे...

सभी कार्यक्रम ठीक-ठाक निबटा कर
अपन पानीपत पहुँच गए और अब आपके समक्ष हैं....

तो हो जाए दो-चार पंक्तियाँ

लीजिये एक दोहा प्रस्तुत करता हूँ कि

क्या मेरी क्या आपकी सब की बात समान..
रोता जब-जब आदमी हँसता सकल जहान...
--योगेन्द्र मौदगिल

तीन दोहे आते वसन्त के नाम.....

आप सब को 
प्रणाम निवेदित करता हूँ
इस बार का कविसम्मेल्नीय सत्र कुछ लम्बा चला. 
इस बीच दिल्ली, कुरुक्षेत्र व् पंचकूला सहित कुछ और यात्राएं रही... 
पानीपत में बिजली का कहर भी रहा.. और घरेलु व्यस्तताएं भी.....
इन सब के बीच 
अपने स्वास्थ्य से लोहा लेता मैं 
एक बार पुन: आप सब के बीच 
तीन दोहों के साथ उपस्थित हूँ..

तीन दोहे आते वसन्त के नाम 


वासंती संवेदना सुंदर रूप अनूप
रितुगंध अठखेलियाँ काम मोक्ष का रूप

कलकल बहते नीर का शोर सुखद स्वछन्द
प्रेम सुधा का कूल ज्यों रति-मदन आनंद

जय वसन्त जय जय वसन्त ऋतुकुंवर ऋतुराज
नवल धवल नूतन सबल नव्य सनातन साज़
--योगेन्द्र मौदगिल

दो दोहे प्रस्तुत करता हूँ कि ........

आज ५ जनवरी है 
तडके लगभग ४ बजे वापसी हुई 
पानीपत आ गया 
१ जनवरी से सांपला , भुसावल,  रतलाम के 
कवि सम्मेलनों को निबटाते हुए थकान के मारे सोकर अब उठा हूँ 
और देखता हूँ कि इस बीच और क्या-क्या हुआ...

कुछ विशेष समझ में नहीं आ रहा कि 
क्या लिखूं क्या पोस्ट करूं 
फिर भी दो दोहे प्रस्तुत करता हूँ 
कि

सच में मोती सीप सम प्रीत सुखद अनमोल
पर तन को सांकल लगा मन की सांकल खोल

क्या बतलाएं आपको अनहोनी का हाल
चिंतित दुनिया हो रही मस्ती से कंगाल
--योगेन्द्र मौदगिल

सात दोहे ......

काजल भाई 
 
जब तक जीवन है 
बोध है 
कलम है 
तब तक दोहों की भला क्या कमी......?

लीजिये आज के 
सात दोहे 
पेश हैं 



हाँ एक प्रश्न सभी प्रिय पाठकों से 
कि यदि दोहा विधा से बोरियत हो रही है तो ग़ज़ल प्रारंभ करूँ क्या ? 


 विज्ञापन युग  है लगी, इत-उत शिक्षा सेल. 
बिन पोथी बी. ए. करें, अब तो दसवीं फेल..

आँखों पर चर्बी चढ़ी भटक गया ईमान 
आँख खोल कर बावले जग की रख पहचान

ऊपर-ऊपर तो चला, रामकथा का दौर.
कामकथा भीतर चली, ना चर्चा, ना शोर..

भरी उम्र करते रहे, या भोजन, या भोग.
आँख के अंधे, गाँठ के, पूरे देखे लोग..

टूटी-कुचली टहनियां, मसली-मसली घास.
लगता है वनराज ने, पुन: रचाया रास..

जिनके-जिनके पास था, चोरी का सामान.
वे लम्बे कुरते हुए, सम्मेलन की शान..

छंद ज्ञान भी हो गया, अपना तो बेकार.
हा-हा, ही-ही का मगर, खूब चला व्यापार..
 
--योगेन्द्र मौदगिल

आज के ६ दोहे......

आज के ६ दोहे बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत हैं
सम्बन्धों की इस कदर टुकड़े-टुकड़े डोर
पिता खड़ा इस ऒर तो पुत्र खड़ा उस ऒर

पिता-पुत्र में ठन गयी निकल पड़ी तलवार
बूढ़ा बरगद रो पड़ा देख समय की धार

हाथ-पांव ढीले पड़े मुरझा गया शरीर
बेटे बोले बाप से खिंचवा ले तस्वीर

घोड़ी चढ़ने तक रहा मैं अम्मां की आस
पांव बहू के क्या पड़े अम्मां हो गयी सास

जनवासे में देख कर वर का मान-गुमान
बाबू जी बिलखे बहुत कर के कन्यादान

दादी क्यों नहीं मानती पोती शीतल छांव
सुन-सुन ताने कांपते बहू के भारी पांव

--योगेन्द्र मौदगिल

५ दोहों की बारी.......

मैं एक विचित्र ऊहापोह में था 
भाई सतीश जी ने उबार लिया 
सही समय पर सही सलाह दे डाली 
अब मैं निश्चिन्त हूँ लेकिन इस सब के बावजूद 
दुष्यंत कुमार का एक मतला याद आ रहा है 
कि 
मत कहो आकाश में कोहरा घना है 
ये किसी कि व्यक्तिगत आलोचना है 
खैर  
चूंकि आज 
५ दोहों की बारी है 
सो प्रस्तुत कर रहा हूँ  
कि
पत्थर-झंडे गाड़ कर ऊंची करी दूकान 
पंडिज्जी लाला हुए बेच बेच भगवान 

चौबीसों घंटे मांगता अब तो पेप्सी कैन 
मेरा बेटा हो गया तेंदुलकर का फैन

घर में टीवी बेचता चड्डी और बनियान 
बच्चे इंचीटेप ले नाप रहे सामान

टीवी पर सब देखते कूल्हों के अम्बार 
उनके आगे व्यर्थ है ख़बरों का संसार

नित्य जंग लडती रही साँवरियों की टीम 
दिवास्वप्न थी बाँटती गोरेपन की क्रीम
--योगेन्द्र मौदगिल 

बात बात में ढेर..........

समझने वालो की समझदारी का सम्मान करना चाहिए............
हम तो भैय्या......
सब कुछ सीखा हमने न सीखी हुशियारी
सच है दुनिया वालों के हम हैं अनाड़ी
खैर .........

वायदानुसार ४ दोहे प्रस्तुत हैं कि

पीठ दिखा कर हो गए, बात बात में ढेर.

 
घर का नाम डुबो रहे, पट्ठे घर के शेर ..


 
लोग बावले हो गए, सुन कर तीन के तीस.


चाँद  चढ़ा  चम्पत हुए, चोर चार सो बीस..



पहले आँखें मूँद कर, खूब बढाया रोग.

 
आग लगी तो फिर कुआँ, चले खोदने लोग..


 
अग-जग को दिखता नहीं, अपने मन का खोट.

 
देख पराया सुख लगे, अंगारों पर लोट..


--योगेन्द्र मौदगिल

तीन दोहे .......

रेमिंगटन की-बोर्ड में 'ज्ञ' नहीं मिला.
कट्टिंग-पेस्ट का आइडिया अच्छा है. इसके लिए आभार..
आज की यह पोस्ट ब्लोगर मित्र विनोद पाण्डेय को समर्पित. 
जो कल नोएडा से पानीपत आकर सारा दिन मेरे साथ सिर्फ इसलिए रहे 
कि उन्हें मुझसे मिलना था 

बहरहाल वायदे के अनुसार आज 
तीन दोहे 
प्रस्तुत हैं 
कि 


वानप्रस्थ जब खोजता, माया व मधुमास. 
तब-तब हिस्से राम के, आता है बनवास..

भगवों पर भारी हुए, अब तो धन के ईश.
संतों ने भी बेचने, शुरू किये आशीष..

ना मन में संवेदना, ना रिश्तों में ठाट.
घर में रखता कौन है, आज फ़ालतू खाट..
--योगेन्द्र मौदगिल


दो दोहे ........

आज दो दोहे,
कल तीन,
परसों चार,
दस तक होने के बाद ग़ज़ल प्रारंभ करूंगा.
तब तक मेरा टायपिंग का 
आपका पढ़ने का अभ्यास हो जायेगा .
 
इस बीच कोई विशेष व्यस्तता नहीं है सो टिपियाना भी जारी रहेगा 
(लेन-देन के माहिर नोट करें)
 
August २२ को जोधपुर, २५ को बेतिया (बिहार) की 
कविसम्मेलनीय यात्रा रहेगी 
वहां के ब्लागर मित्र 
098962 02929 या 094662 02099 पर सम्पर्क कर सकते हैं 
 
लीजिये 
दो दोहे 
विग्यापन युग है लगी, धन की अंधी रेस.
तन के ग्राहक ढूंढते, ज़िस्मों के शो-केस.. 
 
अंधे को आंखें मिली, दूर हुआ अंधेर.
खुली आंख दिखने लगा, आंख-आंख में फेर..
--योगेन्द्र मौदगिल

देश में कालिदास के........

कुछ दोहे और हाज़िर करता हूं...........


अब किसका विश्वास हो, किसका करें यक़ीन.
ना कौड़ी के तीन हैं, ना तेरह में तीन..


लक्कड़बग्घे, तेंदुए, गीदड़, कव्वे, सांप.
खड़े इलैक्शन में हुए, तन पर खादी ढांप.


समय-समय की बात है, समय-समय का फेर.
चश्में चोकन्ने फिरैं, अन्धे हाथ बटेर.


पंत, निराला, जायसी, याद नहीं टैगौर.
नवपीढ़ी की सोच में, बस केबल का दौर.


बच्चा-बच्चा जानता, यहां देह का अर्थ.
देश में कालिदास के, केबल हुआ समर्थ.


अग्निपरीक्षा-चीरहरण, जब-तब भरी जमात.
सीता हो या द्रौपदी, हैं औरत की जात.


घर में भी चलने लगा, जंगल का कानून.
जितने पैने दांत हों, उतना मिलता खून.
--योगेन्द्र मौदगिल

कुछ दोहे.........

कुछ दोहों और कईं दिनों की अनुपस्थिति हेतु खेद सहित उपस्थित हूं आज


आंगन से कहने लगी, रो-रो कर दहलीज़.
दक्षिण दरवाज़े गये, पश्चिम गयी तमीज़.

सत्य-सनातन परम्परा, पूजा-पाठ विचार.
गये लुटेरे लूट कर, सात समंदर पार.

राम-कथा के नाम पर, धंदे का संयोग.
कैसेट, बैनर, पोस्टर, बेच रहे हैं लोग.

उसका बंटी भूख से, तड़प रहा बेहाल.
उनके टामी ने चखे, दूध-दही के थाल.

छंद ग्यान भी हो गया, अपना तो बेकार.
चार चुटकुलों का मगर, खूब चला व्यापार.

देह निमंत्रण रख दिया, उसने निस्संकोच.
सुंदर तन भीतर छिपी, बहुत घिनौनी सोच.

कीचड़ में नेता सने, गोबर सने किसान.
जनता गारे में धंसी, दलदल हिन्दुस्तान.
--योगेन्द्र मौदगिल