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नंगी टांगो का नशा

राजनेताओं और अरबपति बाबाओं से 
विवेक की अपेक्षा रखने वाले 
मूढ़ श्रोताओं-पाठकों के नाम




धन के मद में चूर हैं मंत्री-संत्री-संत.
इसीलिए आतंक का नहीं दीखता अंत..

जनता बेचारी मरी सत्ता बे-अफ़सोस.
सिद्ध हो गया देख लो समरथ को नहि दोस..

फैशन शो चलता रहा, मंत्री जी मद - मस्त.
नंगी टांगो का नशा बुद्धि करता ध्वस्त..


नेता गति बखानते, जनता हाहाकार..
मुंबई हाय इत्ती बड़ी, और धमाके चार. ?

सत्ता कहती क्या हुआ..हुए अगर विस्फोट.
ये तो दुनिया का चलन, इस में क्या है खोट..
--योगेन्द्र मौदगिल 





एक दोहा ...................

14 मार्च है आज.
एकदम फुर्सत में हूँ.
न कोई कवि सम्मेलन न गोष्ठी.
जरूरी भी था क्योंकि जाट आरक्षण समर्थकों के
धरने के कारण रेल मार्ग अवरुद्ध थे
कहीं बस तो कहीं रेल..अपन पानीपत कल रात
ही पहुँच गए थे.....

खैर
१० मार्च को बरेली में
कुमार विश्वास (गाज़ियाबाद) सुरेन्द्र शर्मा (दिल्ली),
योगेन्द्र मोदगिल (पानीपत), कमलेश मृदु (सीतापुर) ,
अर्जुन सिसोदिया (गुलावठी), नेहा भारद्वाज (बदायू),
व्यंजना शुक्ल (लखनऊ), राजेश गौड़ व्
कमल सक्सेना बरेली उपस्थित रहे.....

ब्लागर दयानिधि वत्स जी
से होटल में ही मुलाकात हो गई थी पर
हम देरी से पहुंचे थे सो कोई सार्थक बातचीत नहीं हो सकी..
वो कार्यक्रम स्थल तक पहुंचे या नहीं
ये मुझे अभी तक नहीं पता क्योंकि
तब से अब तक उनसे कोई बात नहीं हो सकी...

११ मार्च को भारत इंजीनियरिंग कालेज मोहना में
डाक्टर शम्भू सिंह मनहर (खरगोन), डाक्टर अशोक बत्रा (सोनीपत), डाक्टर गजराज कोशिक (गोहाना), कमल सक्सेना (बरेली),
योगेन्द्र मोदगिल (पानीपत), अशोक शर्मा (दिल्ली),
कीर्ति माथुर (अलीगढ) व् शशिप्रभा जी उपस्थित रही..

१२ मार्च के कार्यक्रम हरदोई  में
रमेश शर्मा (चित्तोडगढ), शशिकांत यादव (देवास),
योगेन्द्र मोदगिल (पानीपत), संजय शुक्ल (कोटा),
उमेश उत्साही (जयपुर), सबरस मुरसानी (भरतपुर),
कमल सक्सेना (बरेली), राधेशाम भारती (इलाहबाद),
देवेश तिवारी (दिल्ली), अनु सपन (भोपाल) और
दादा वेदव्रत बाजपेई (लखनऊ) उपस्थित रहे...

सभी कार्यक्रम ठीक-ठाक निबटा कर
अपन पानीपत पहुँच गए और अब आपके समक्ष हैं....

तो हो जाए दो-चार पंक्तियाँ

लीजिये एक दोहा प्रस्तुत करता हूँ कि

क्या मेरी क्या आपकी सब की बात समान..
रोता जब-जब आदमी हँसता सकल जहान...
--योगेन्द्र मौदगिल

अभी भी थोड़ी दिक्कत है ........

अभी भी थोड़ी दिक्कत है
काबू नहीं आ रहा
हिंदी टंकण के टूल्स नहीं मिल रहे
यह टाइपिंग याने पहले रोमन में लिख स्पेस दबा कर काम चला रहा हूँ
फिलहाल एक दोहा और देखें कि

संबंधों की व्याकरण, निजता के अनुबंध.
जीवन भर सहते रहे, केवल काम-प्रबंध..
--योगेन्द्र मौदगिल  

लो मैं आ गया ........

सभी मित्रों को प्रणाम
विंडो करप्ट और हार्ड डिस्क खल्लास
लेकिन हार्ड डिस्क कम्बक्त गारंटी में थी
सो कम्प्यूटर वाले ने
बदलने भेज दी
लगभग दो महीने बाद मिली  है
अभ्यास छूट गया है लेकिन  
एक दोहे के साथ अपनी उपस्तिथि दर्ज करवा रहा हूँ

कि
 देखो मेरे लाल का कितना खूब कमाल
कल तक जी का खेल था अब जी का जंजाल
--- योगेन्द्र मौदगिल

देश में कालिदास के........

कुछ दोहे और हाज़िर करता हूं...........


अब किसका विश्वास हो, किसका करें यक़ीन.
ना कौड़ी के तीन हैं, ना तेरह में तीन..


लक्कड़बग्घे, तेंदुए, गीदड़, कव्वे, सांप.
खड़े इलैक्शन में हुए, तन पर खादी ढांप.


समय-समय की बात है, समय-समय का फेर.
चश्में चोकन्ने फिरैं, अन्धे हाथ बटेर.


पंत, निराला, जायसी, याद नहीं टैगौर.
नवपीढ़ी की सोच में, बस केबल का दौर.


बच्चा-बच्चा जानता, यहां देह का अर्थ.
देश में कालिदास के, केबल हुआ समर्थ.


अग्निपरीक्षा-चीरहरण, जब-तब भरी जमात.
सीता हो या द्रौपदी, हैं औरत की जात.


घर में भी चलने लगा, जंगल का कानून.
जितने पैने दांत हों, उतना मिलता खून.
--योगेन्द्र मौदगिल

कुछ दोहे.........

कुछ दोहों और कईं दिनों की अनुपस्थिति हेतु खेद सहित उपस्थित हूं आज


आंगन से कहने लगी, रो-रो कर दहलीज़.
दक्षिण दरवाज़े गये, पश्चिम गयी तमीज़.

सत्य-सनातन परम्परा, पूजा-पाठ विचार.
गये लुटेरे लूट कर, सात समंदर पार.

राम-कथा के नाम पर, धंदे का संयोग.
कैसेट, बैनर, पोस्टर, बेच रहे हैं लोग.

उसका बंटी भूख से, तड़प रहा बेहाल.
उनके टामी ने चखे, दूध-दही के थाल.

छंद ग्यान भी हो गया, अपना तो बेकार.
चार चुटकुलों का मगर, खूब चला व्यापार.

देह निमंत्रण रख दिया, उसने निस्संकोच.
सुंदर तन भीतर छिपी, बहुत घिनौनी सोच.

कीचड़ में नेता सने, गोबर सने किसान.
जनता गारे में धंसी, दलदल हिन्दुस्तान.
--योगेन्द्र मौदगिल