राजनेताओं और अरबपति बाबाओं से
विवेक की अपेक्षा रखने वाले
मूढ़ श्रोताओं-पाठकों के नाम
धन के मद में चूर हैं मंत्री-संत्री-संत.
इसीलिए आतंक का नहीं दीखता अंत..
जनता बेचारी मरी सत्ता बे-अफ़सोस.
सिद्ध हो गया देख लो समरथ को नहि दोस..
फैशन शो चलता रहा, मंत्री जी मद - मस्त.
नंगी टांगो का नशा बुद्धि करता ध्वस्त..
नेता गति बखानते, जनता हाहाकार..
मुंबई हाय इत्ती बड़ी, और धमाके चार. ?
सत्ता कहती क्या हुआ..हुए अगर विस्फोट.
ये तो दुनिया का चलन, इस में क्या है खोट..