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दो दोहे प्रस्तुत करता हूँ कि ........

आज ५ जनवरी है 
तडके लगभग ४ बजे वापसी हुई 
पानीपत आ गया 
१ जनवरी से सांपला , भुसावल,  रतलाम के 
कवि सम्मेलनों को निबटाते हुए थकान के मारे सोकर अब उठा हूँ 
और देखता हूँ कि इस बीच और क्या-क्या हुआ...

कुछ विशेष समझ में नहीं आ रहा कि 
क्या लिखूं क्या पोस्ट करूं 
फिर भी दो दोहे प्रस्तुत करता हूँ 
कि

सच में मोती सीप सम प्रीत सुखद अनमोल
पर तन को सांकल लगा मन की सांकल खोल

क्या बतलाएं आपको अनहोनी का हाल
चिंतित दुनिया हो रही मस्ती से कंगाल
--योगेन्द्र मौदगिल

राजनीत मंथन करी... (दोहे)

उघड़े-नंगे नागरिक, करते रहे सवाल.
नेता मुस्काते रहे, ऒढ़े मोटी खाल.

वानप्रस्थ जब खोजता, माया अर मधुमास.
तब-तब हिस्से राम के, आता है बनवास.

जातपात-फिरकापरस्त, भेदभाव-विध्वंस.
राजनीत की गोद में, पोषित रावण-कंस.

लक्कड़बग्घे, तेंदुए, गीदड़, कव्वे, सांप.
खड़े इलैक्शन में हुये, तन पर खादी ढांप.

भीतर-भीतर खूब है, कटुता-खींचातान.
स्वयंसिद्ध अपवाद है, राजनीत की आन.

राजनीत मंथन करी, प्राप्त हुआ ये ग्यान.
राम-कृष्ण के देश में, तिकड़म है बलवान.

राजनीत अब तो बनी, इक ऐसा उद्योग.
हानि जिस में है नहीं, सिर्फ लाभ का योग.

राजनीति में इसलिये, करते लोग निवेश.
कुटिया से पहुंचें महल, बदल सकल परिवेष.

सिंह पींजरे में पड़े, बुरी बखत की मार.
जंगल ने फिर से चुनी, गीदड़ की सरकार.

विस्फोटक है योजना, तंत्र हुआ उद्दण्ड.
शुभ्र-वसन विद्रूपता, नीतिगत पाखण्ड.

आंखों पट्टी बांध कर, मौन रहा कानून.
जनसेवक पीते रहे, भारत मां का खून.

पर्चे, बैनर, पोस्टर, माइक, मंच-प्रसार.
नेता जी ने कर लिये, काबू सब हथियार.
--योगेन्द्र मौदगिल