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दो चुनावी छंद...

भगवान महावीर जयन्ती के उपलक्ष्य में देश भर में आयोजित कवि-सम्मेलनीय श्रंखला के चलते कईं दिनों के पश्चात इस चुनावी माहौल में दो मंचीय छंदों के साथ उपस्थित हूं

जंगल में घोषित हुआ जब से चुनाव प्यारे
बाज लगे चिड़ियों के हाथ-पांव थामने
शेरों का टिकट कट गीदड़ों को मिल गया
शेरों को डुबोया भाई कुल-गोत्र नाम ने
भेड़ियों ने मेमनों का ऐसा सत्कार किया
भूल गये मेमने कि भेड़िये हैं सामने
ऐसा दुर्दिन दिखलाना ही लिखा था भाई
भारत के भाग्य और भारती के राम ने

द्वार-द्वार घूमते हैं चूमते हैं वोटरों के
हाथ-पांव सिर-पेट और नाक-कान जी
इलैक्शन से पहले द्वार-द्वार वोटरों को यह
बांटते हैं अपने पिता सा सम्मान जी
नेता बहुरूपिये प्रयासरत इन दिनों
जनता में बन जाये अच्छी पहचान जी
पांच-सात दिन बोयें वायदों के बीज फिर
पांच साल काटते रहेंगें हिन्दुस्तान जी
--योगेन्द्र मौदगिल


जैसे हो अंगारा चांद......

आप सब को नमन करता हूं
विषयांतर करता हुआ अन्यान्य विषय समेटे एक ग़ज़ल आप सभी को समर्पित करता हूं

मन में खुशियां हो तो लगता, है आंखों का तारा चांद.
विरही मन को लगता ऐसे जैसे हो अंगारा चांद.

पिया गये परदेस वहीं के हो बैठे तुम बतलाऒ,
करवाचौथ कहां से लाए अपने लिये उधारा चांद ?

आदम ने अब खोज लिये हैं रस्ते इस तक आने के,
कब तक सुथरा रह पाऊंगा सोच रहा बेचारा चांद ?

तनखा थोड़ी, खरचे ज्यादा, तिस पर बिटिया बड़ी हुई,
देख-देख कर दुनिया के ढंग कैसे करे गुजारा चांद.

प्रेम चकोरी से मिलने को सारी रात भटकता है,
मत सोचो के फिरता है बस यों ही मारा-मारा चांद.

अपने-अपने भाग मौदगिल किसे दोष दें बतलाऒ,
पूनम को बेटे सा लगता विरहिन को हत्यारा चांद.
--योगेन्द्र मौदगिल

ज़माना लुच्चों का........

झूठ की जै-जैकार, ज़माना लुच्चों का.
सच्चों को दुत्कार, ज़माना लुच्चों का.

टीवी, फिल्में, विग्यापन, अखबार सभी,
कपड़े रहे उतार, ज़माना लुच्चों का.

राज्य-सदन हो संसद या मंदिर-मस्ज़िद,
सब नोटों के यार, ज़माना लुच्चों का.

हमें शान्तिपाठ सिखाने वाले स्वयं,
बेच रहे हथियार, ज़माना लुच्चों का.

रंगदारी-अपहरण हुए उद्योगों से,
जन-गण-मन लाचार, ज़माना लुच्चों का.

सांडों के झगड़े में, शामत बछड़ों की,
दर्शक रंगे सियार, ज़माना लुच्चों का.

मर्द ढके कपड़ों में, औरत चिन्दी में,
क्या फैशन है यार, ज़माना लुच्चों का.

सारी दुनिया डूब, गई है पापों में,
लुच्चों की भरमार, ज़माना लुच्चों का.
--योगेन्द्र मौदगिल

दो व्यंग्यचित्र


बेशक आदमी का दिमाग बहुत बड़ा है
लेकिन दिल बहुत छोटा है
इसीलिये उसके आविष्कारों में
प्यार का टोटा है
अन्यथा श्रीमान्
मंगल और चांद पर
पानी की खोज में लगा विग्यान
थोड़ा सा तो लगाए धरती पर ध्यान
कि अभी भी इस धरती पर
बिन पानी के लोग रहते हैं
एक घड़ा भरने के लिए
रेत के दरिया में दूर तक बहते हैं
अरे जिस दिन
पृथ्वी के प्रत्येक भूभाग में
पीने को स्वच्छ पानी
सहज सुलभ हो जाएगा
देख लेना
मंगल और चांद का पानी तो
यहीं से नजर आ जाएगा
यहीं से नजर आ जाएगा



जलसे-जुलूस-मेले
बीच बाज़ार या अकेले
स्त्री देह
मात्र नयन पिपासा को झेले
हाय री विडम्बना
चरित्र की हेठी
कहीं पर भी तो नहीं दीखती
बहन या बेटी
हर और
प्रेयसियां या वारांगनाए
कोरा नेत्रविलास
या कुंठित भोगेच्छाएं
सत्य में जीवित नहीं हम
हो चुका है आत्मा का मरण
क्योंकि बेचारा अन्तःकरण
बच भी कैसे पाएगा
जैसा अन्न खाएगा
वैसा ही तो निभाएगा
--योगेन्द्र मौदगिल

कुछ दोहे

घर का भेदी तोड़ कर, लंका लीनी जीत.
जा हमने भी देख ली, रघुकुल तेरी रीत..

भ्रष्ट राजनीति हुई, चौपट हुआ समाज.
हर वानर को चाहिये, किष्किन्धा का राज..

नयी नस्ल की देखिये, कितनी ऊंची कूद.
बच्चे भी रखने लगे, बस्तों में बारूद..

हाथ-पांव ढीले पड़े, मुरझा गया शरीर.
बेटे बोले बाप से, खिंचवा ले तस्वीर..

मात्-पिता हर्षित हुए, गये दिनों को भूल.
दसवीं फेल सपूत ने, खोला पब्लिक स्कूल..

दिल्ली के दरबार में, बर्बरता का राज.
बायें रक्त-पिशाच हैं, दायें अर्थ-पिशाच..

सोया गहरी नींद में, घर का सिरजनहार..
अगल-बगल के भेड़िये, नाप रहे दीवार..

गंगा-यमुना झेलती, पोल्यूशन की मार.
पेप्सी ले कर हाथ में, झूम रही सरकार..
--योगेन्द्र मौदगिल

कुछ क्षणिकाएं....


मां बेटी को
आधुनिकता
इतनी रास आई
कि गज़ब हो गया
बेटी ने प्यार किया
और ब्याह मां का हो गया


मलेरिया उन्मूलन विभाग के कर्मचारी
सुदूर देहात में आए
मलेरिया की दवा मुफ्त में दे गये
और एड्स मुफ्त में ले गये


पढ़ते ही बलात्कार का समाचार
उनके चेहरे पर आ गयी बहार
मस्ती से गर्दन हिलाने लगे
हौले हौले गुनगुनाने लगे
--ये देश है वीर जवानों का
अलबेलों का मस्तानों का
इस देश का यारों क्या कहना
इस देश का यारों क्या कहना------


योजना विभाग
की योजना है कि
कोई ऐसी योजना बनाई जाए
कि मलाई के साथ साथ
कटोरी भी खाई जाए
--योगेन्द्र मौदगिल

एक रचना + एक निमंत्रण

जितनी सुन्दर नेमप्लेट.
उतने ऊंचे घर के गेट.

पेट भरा हो-लगता है,
भरा-भरा सा सबका पेट.

खूब चढ़ाता मन्दिर में,
बहियों से कर-कर आखेट.

जितना उत्पादन हो यार,
उतना क्यों गिर जाता रेट.

छोड़ के दारू बच्चों को,
ला दे कापी और स्लेट.

टुक-टुक देख रहा है यार,
घर है कोई भूखे पेट.
--योगेन्द्र मौदगिल





-----------------------------------रचनाएं आमंत्रित--------------------------------
आपकी प्रिय पत्रिका सरस्वति-सुमन के
शीघ्र प्रकाश्य
हास्य-व्यंग्य विशेषांक के लिये
समस्त गद्य-पद्य विधाऒं यथा आलेख ग़ज़ल दोहा कवित्त कविता आदि में आप सब की मौलिक एवं अप्रकाशित रचनाएं सादर आमंत्रित हैं

-इस विशेषांक के अतिथि संपादक योगेन्द्र मौदगिल हैं

-यथासंभव शीघ्र अपनी रचनाएं निम्न पते पर प्रेषित करें

-योगेन्द्र मौदगिल
अ सं -- सरस्वति-सुमन त्रैमासिक
२३९३-९४ न्यू हाउसिंग बोर्ड सैक्टर १२ पानीपत १३२१०३ हरियाणा
मो ०९८९६२०२९२९ व ०९४६६२०२०९९

आप रचनाएं इ-मेल द्वारा ymoudgil@gmail.com पर भी भेज सकते हैं परन्तु सुशालिपि या युनीकोड में
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ये परदे की कलाकारी



भँवर से बच के निकलें जो उन्हें साहिल डुबोते हैं
अजूबे तेरी दुनिया में कभी ऐसे भी होते हैं

ये परदे की कलाकारी भला व्यवहार थोड़े है
जो रिश्तों को बनाते हैं वही रिश्तों को खोते हैं

वो फूलों से भी सुंदर हैं वो कलियों से भी कोमल हैं
मुहब्बत करने वाले खूबसूरत लोग होते हैं

किसी को पेट भरने तक मयस्सर भी नहीं रोटी
बहुत से लोग खा-खा कर यहां बीमार होते हैं

जिन्हें रातों में बिस्तर के कभी दर्शन नहीं होते
बिछा कर धूप का टुकड़ा ऒढ़ अखब़ार सोते हैं

हमीं ने आसमानों को सितारों से सजाया है
हमीं धरती के सीने में बसंती बीज बोते हैं

मुहब्बत से भरी नज़रें तो मिलती हैं मुकद्दर से
बहुत से लोग नज़रों के मगर नश्तर चुभोते हैं
--योगेन्द्र मौदगिल

देख ल्यो जी म्हारे कार्टून

जी हां ये देखिये
योगेश समदर्शी जी ने साहित्य शिल्पी पर मेरा ये कार्टून बनाया सुनीता जी और राजीव जी भी मेरे साथ


और ये देखिये
ताऊ रामपुरिया ने भी खेत से कव्वे उड़वाये


और ये देखिये
पंकज सुबीर जी ने भांग पीकर खुद भी साड़ी पहनी मुझे भी पहनायी

साहित्य-शिल्पी और ताऊ रामपुरिया और पंकज सुबीर जी को मेरी ऒर से सादर समर्पित & विनय प्रजापति का विशेष आभार इस पोस्ट के प्रकाशन में सहयोग देने के लिये

महावीर जी सतपाल जी और सुबीर जी को सादर

होली पर बहुत व्यस्तता रही इस बार
कविसम्मेलन लगातार लगातार
अब फुरसत में हूं
तो फिर वही कम्प्यूटर यार

बस अब आप सभी के साथ
ब्लाग-गंगा में डुबकी लगायेंगें

पढ़ेंगें और टिपियायेंगें

अभी भी मौसम होलियाना है
या यों कहिये कि एक-दो रचनाएं आप सब को पढ़वाने का बहाना है

तो प्रस्तुत है फिलहाल आप सबके लिये
महावीर जी के ब्लाग पर छपे मेरे दो छंद

होली के बहाने करें गोरियों के गाल लाल
अंग पे अनंग की तरंग आज छाई सी
बसंत की उमंग, मन होली के बहाने चढ़ी
भंग की तरंग रंग ढंग बल खाई सी
सजना मलंग हुए सजनी मृदंग हुई
रास रति रंग रत हवा लहराई सी
दंग हुए देख लोग प्रेम के प्रसंग आज
छुइ मुइ जोड़ियां भी कैसी मस्ताई सी


मीठी मीठी बोलियों के भीगी भीगी चोलियों के
होली के नजारे सब आंखों को सुहाते हैं
रस रंग भाव रंग लय रंग ताल रंग
देख के उमंग को अनंग मुस्काते हैं
सारे मगरूर हुए भंग के नशे में चूर
प्रेम के पुजारी हो मलंग इठलाते हैं
लाग ना लपेट कोई ईर्ष्या ना द्वेष कोई
प्रेम के त्यौहार ही प्रसंग सुलझाते हैं


और अब पढ़िये
सतपाल जी के ब्लाग पर छपी मेरी एक और ग़ज़ल

झूम रहा संसार, फाग की मस्ती में.
रंगों की बौछार, फाग की मस्ती में.

सारे लंबरदार, फाग की मस्ती में.
बूढ़े-बच्चे-नार, फाग की मस्ती में.

गले मिले जुम्मन चाचा, हरिया काका,
भूले मन की खार फाग की मस्ती में.

जाने कैसी भांग पिला दी साली ने,
बीवी दिखती चार, फाग की मस्ती में.

आंगन में उट्ठी जो बातों-बातों में,
तोड़ें वो दीवार, फाग की मस्ती में.

चाचा चरतु चिलम चढ़ा कर चांद चढ़े,
चाची भी तैयार, फाग की मस्ती में.

इतनी चमचम, इतनी गुझिया खा डाली,
हुए पेट बेकार फाग की मस्ती में.

काली करतूतों को बक्से में धर कर,
गली में आजा यार फाग की मस्ती में.

ननदों ने भी पकड़, भाभी के भैय्या को,
दी पिचकारी मार, फाग की मस्ती में.

कईं तिलंगे खड़े चौंक में भांप रहे,
पायल की झंकार, फाग की मस्ती में.

गुब्बारे दर गुब्बारे दर गुब्बारे.......
हाय हाय सित्कार, फाग की मस्ती में.

होली है अनुबंधों की, प्रतिबंध नहीं,
सब का बेड़ा पार, फाग की मस्ती में.

चिड़िया ने भी चिड़े को फ्लाइंग-किस मारी,
दोनों पंख पसार फाग की मस्ती में.

कीचड़ रक्खें दूर 'मौदगिल' रंगों से,
भली करे करतार, फाग की मस्ती में.


और अंत में पढ़िये
सुबीर जी के ब्लाग पर छपी मेरी तरही ग़ज़ल


तेरे अब्बू ने जो लटकाये ताले याद आते हैं
वो पहरेदारी जो करते थे साले याद आते हैं

वो टूटा नल वो गीला तौलिया वो फर्श की फिस्लन
लगे थे गुस्लखाने में वो जाले याद आते हैं

वो रमज़ानी के कोठे पै जो मुरगा बांग देता था
उसी के साथ में उगते उजाले याद आते हैं

कोइ उल्लू का पट्ठा एक दिन भी बांध ना पाया
तेरे सब पालतू कुत्ते वो काले याद आते हैं

बहुत रुसवा किया तूने हमेशा तोड़ कर वादे
मुझे अब भी वो वादों के हवाले याद आते हैं

वो टीटू-नीटू अब भी अल्लसुब्ह ही बैठते होंगें
तुम्हारे शहर के गंदे वो नाले याद आते हैं

जो थी हमने कही ग़ज़लें कि वो तो भूल बैठे हम
तेरे मामू ने जो लिक्खे मक़ाले याद आते हैं

तेरी अम्मां भी झुकती थी तेरा अब्बू भी झुकता था
तेरी दीवार के सैय्यद के आले याद आते हैं

कुछ मित्रों ने मेरा सदुपयोग अपने ब्लाग पर कार्टून बना कर भी किया वो इसके बाद
अभी तो फिलहाल इतना ही
-योगेन्द्र मौदगिल

कुछ नहीं बस.....

कुछ नहीं बस आदतन लाचार हैं.
तेरे दीवाने बड़े हुशियार हैं.

धीरे-धीरे गरदनों को नाप कर,
आरियों के साथ वो तैयार हैं.

वक्त जाने और क्या दिखलाएगा,
डाकुऒं के साथ पहरेदार हैं.

काट डाले पेड़ नदियां रोक दीं,
और कहते है कि हम बीमार हैं.

बात जो सच्ची है उसको गाऊंगा,
जानता हूं सब लिये तलवार हैं.

देख लेना एक दिन झुक जाएंगें,
पेड़ जितने भी यहां फलदार हैं.

बज गया डंका इलैक्शन का मियां,
शहर के बेकार भी बा-कार हैं.

जिन्दगी की तो चढ़ा देते बलि,
पत्थरों के लोग ताबेदार हैं.

हैं बुजुर्गों के लबों पर गालियां,
और बच्चे भी लिये हथियार हैं.

'मौदगिल' बाजार उनके बस में है,
वो कि जिनके हाथ में दीनार हैं.
--योगेन्द्र मौदगिल

नेता.....

जब कुछ न हो सका तो साला हो गया नेता.
ख़ाक़ियों को, ख़ादियों को धो गया नेता.

हिंदु हुये हिंदु तो मुल्ले हो गये मुल्ले,
बंटवारे के ये बीज पट्ठा बो गया नेता.

सुल्गे हुए चौराहों पे जलती रही जनता,
घर जा के एसी आन कर के सो गया नेता.

जनता ने, पत्रकारों ने जो पूछे कुछ सवाल,
फिर कैमरे के सामने ही रो गया नेता.

थक गईं फिर पुतलियां जनता की आंख की,
वापिस नहीं आया अगरचे जो गया नेता.
--योगेन्द्र मौदगिल

देश का क्या होगा..?

मित्रवर ईष्टदेव सांकृत्यायन जी को सादर समर्पित

इस रचना के बारे में एक बात बताना चाहता हूं कि ये रचना हुई कैसे,

दरअसल मुझे जूते खरीदने थे तो अपने शाम की बैठक के एक मित्र सलूजा जी को मैने कहा कि यार आपके जूते बहुत बढ़िया हैं. मैं भी ऐसे ही जूते लेना चाहता हूं. कहा से लिये..?
सलूजा जी बोले, यार, ये पैग खत्म करो फिर जूते लेने ही चलते हैं और वो मुझे अपनी गाड़ी में बिठा कर जीटीरोड पर एक बड़े शोरूम में ले गये. सेल्जमैन जो उनका परिचित था लपक कर सलाम ठोकता आया. नमस्ते तो उसने मुझे भी की पर उसने मेरे पैरों में पहने जूते देख कर उन जूतों के स्टेटस के हिसाब से...
उसने जूते दिखाने शुरू किये हालांकि मैं भी कुछ काम्प्लैक्स में था पर फिर भी हिम्मत कर दो-तीन जोड़ी अलग रख उनका दाम पूछा तो ३६०० से ४५०० रू के बीच में था मुझे ऐसा लगा कि उसने जूतों का दाम नहीं बताया साला जूता ही उठा कर मार दिया तमाचे की तरह... अपनी तो लग्ज़री बाटा या एक्शन पर आकर ही खतम हो जाती है.
मैं उठ खड़ा हुआ. मुझे खड़ा होते देख सलूजा जी भी सकपका कर उठ खड़े हुये. हम बाहर आये. गाड़ी में बैठ कर अगला पैग बनाया. घूंट लेने से पूर्व ही निम्न दो पंक्तियों का जन्म हुआ

जूत हुये गलहार देश का क्या होगा
जूते बंदनवार देश का क्या होगा

हम लौट आये और सुबह उठते ही मैंने चार छंद लिखे उन में टेक लगाई और इस तरह ये पूरी कविता बनी

आप पढ़ें और अपनी राय से अवगत करायें

वाह जूतमपैज़ार, देश का क्या होगा..?
अंधे पहरेदार, देश का क्या होगा..?
प्रश्न यही हरबार, देश का क्या होगा..?
उत्तर ढूंढो यार, देश का क्या होगा..?

शहर की तामझाम लील गयी पुरवा को,
गांव की डगर अब कोई नहीं देखता.
अधनंगी छोरियों के चित्र ढूंढते हैं लोग,
अखबार में खबर अब कोई नहीं देखता.
दिखते शो-पीस जैसे पेड़ वही बीजते हैं,
दरख्तों के समर अब कोई नहीं देखता.
ठाट-बाट नापते हैं जूतियों को देख कर,
हाथ का हुनर अब कोई नहीं देखता......

जूते बंदनवार, देश का क्या होगा..?
झूठ का कारोबार, देश का क्या होगा..?
प्रश्न यही हरबार, देश का क्या होगा..?
उत्तर ढूंढो यार, देश का क्या होगा..?

मिली ना दिहाड़ी तो वो फांकता ही रहा धूल,
रोटियों का ख्वाब लिये टूट गयी जूतियां.
डिग्रियों का बैग लिये दफ्तरों की सीढ़ियों से,
एक दिन काया जैसी टूट गयी जूतियां.
बेटियों के लिये वर खोजने गया जो बाप,
उसके यक़ीन जैसी टूट गयी जूतियां.
एक दिन वही हुआ वो जो चाहा ही नहीं था,
छूट गयी दुनिया तो छूट गयी जूतियां.

जूते हैं बदकार, देश का क्या होगा..?
जूते ही घरबार, देश का क्या होगा..?
प्रश्न यही हरबार, देश का क्या होगा..?
उत्तर ढूंढो यार, देश का क्या होगा..?

सत्ता की दलाली फले गोरी-गोरी जूतियों से,
दफ्तरों में चांदी वाली चलती हैं जूतियां.
मुर्गियां फंसती हैं जूतियों के डर से तो,
मछलियां आजकल तलती हैं जूतियां.
नेता जी चुनाव जीत आये तो नेताइन बोली,
इनको तो वोटरों की फलती हैं जूतियां.
संसद से लौटे इक पत्रकार ने बताया,
वहां भी तो आजकल चलती हैं जूतियां.

जूत हुये गलहार, देश का क्या होगा..?
वाह जूतमपैजार, देश का क्या होगा..?
प्रश्न यही हरबार, देश का क्या होगा..?
उत्तर ढूंढो यार, देश का क्या होगा..?

वक्त की अजब मार करना भरोसा पड़ै,
खादी ढकी बिल्लियों पै, बिच्छुऒं पै, जोंक पै.
मूंह से तो चुप्प रहें जूतियों से बात करें,
सारे जूतयार हर उत्सव या शोक पै.
जूतियों में डाल दाल बांट रहे राजनेता,
और जूत चलते है घर-घर-चौक पै.
जूतखोर, सूदखोर, माफिया के भाई लोग,
देश को भी रखते हैं जूतियों की नोक पै.

गुंडे पालनहार, देश का क्या होगा..?
सब जूतों के यार, देश का क्या होगा..?
प्रश्न यही हरबार, देश का क्या होगा..?
उत्तर ढूंढो यार, देश का क्या होगा..?
--योगेन्द्र मौदगिल

पुनश्चः
हास्य-व्यंग्य के पुरोधा कवि अशोक चक्रधर जी ने अपने संचालन में सब टीवी के प्रख्यात कार्यक्रम वाह-वाह में जब जूतमपैजार पर एपिसोड बनाने की सोची तो रात ११-३० पर मुझे फोन कर आदेश किया कि मैं इस कविता की रिकार्डिंग के लिये तुरन्त तैयारी करूं फिर तय कार्यक्रम के अनुसार वाह-वाह में इस का प्रसारण हुआ

गणतंत्र....

रचते हैं रोज नये-नये षड्यंत्र.
नेताऒं को भाता नहीं शारदे का मंत्र.
लोकतंत्र हो गया रे मारपीट तंत्र.
ऐसे में मनाएं बोलो कैसे गणतंत्र ?

राजनीति देश की विषैली हुई रे.
राजनीति कड़वी-कसैली हुई रे.
राजनीति रूपयों की थैली हुई रे.
राजनीति देखो मैली-मैली हुई रे.

बौखलाये नेता-बौखलाया जनतंत्र.
राजधानी ने रचा ये कैसा राजतंत्र ?
लोकतंत्र हो गया रे मारपीट तंत्र.
ऐसे में मनाएं बोलो कैसे गणतंत्र ?

धन्य हैं जी आप, आप राजनेता हैं.
भारती के लिये शाप राजनेता हैं.
तस्करों की नयी खाप राजनेता हैं.
उग्रवादियों के बाप राजनेता हैं.

राजनीति भूल गई गरिमा के मंत्र.
भूल गये लोग सब एकता के मंत्र.
लोकतंत्र हो गया रे मारपीट तंत्र.
ऐसे में मनाएं बोलो कैसे गणतंत्र ?

कहीं तोड़-फोड़, कहीं हड़ताल रे,
नेता सारे चलते हैं टेढ़ी चाल रे,
जनता का हुआ देखो बुरा हाल रे,
छूट गये धंदे, छूटी रोटी-दाल रे,

बहुराष्ट्री कंपनियों का बिछ गया तंत्र.
मल्टीनेशनल ने छुड़ाया स्वदेशी का मंत्र.
लोकतंत्र हो गया रे मारपीट तंत्र.
ऐसे में मनाएं बोलो कैसे गणतंत्र ?

आप से अपील देश-मान कीजिये.
देश के उद्योगों की पहचान कीजिये.
सीमाऒं का देश की सम्मान कीजिये.
बच्चों संग घर-घर राष्ट्रगान कीजिये.

वरना टूट जायेगा ये मूल गणतंत्र.
पूछते फिरोगे सांप काटने का मंत्र.
लोकतंत्र हो गया रे मारपीट तंत्र.
ऐसे में मनाएं बोलो कैसे गणतंत्र ?
--योगेन्द्र मौदगिल

बुद्धु भैय्या....

बुद्धु भैय्या मिल से आकर बिस्तर पर गिर जाते हैं
डण्डी वाला पंखा लेकर घंटों कमर खुजाते हैं

छोटी मुनिया बांह दबाये
बीवी बालों को सुलझाये
फिर भी चैन ना आये उनको
पड़े-पड़े बल खाते हैं
बुद्धु भैय्या मिल से आकर बिस्तर पर गिर जाते हैं
डण्डी वाला पंखा लेकर घंटों कमर खुजाते हैं

मिल-मालिक का नाम बहुत है
मिल के भीतर काम बहुत है
मजदूरों को मिलती कौड़ी
उत्पादन का दाम बहुत है

सारा दिन खटता है बुद्धु
सारा दिन खटता है रंगी
बरस महीना हफ्ता रोजई
रहती है रूपये की तंगी

बुद्धू जो मेहनत करता है
बुद्धु जो हिम्मत करता है
बुद्धु जो बरकत करता है
सारी मालिक खा जाते हैं
बुद्धु भैय्या मिल से आकर बिस्तर पर गिर जाते हैं
डण्डी वाला पंखा लेकर घंटों कमर खुजाते हैं

सारी उमर गंवाई मिल में
पूरी देह लुटाई मिल में
अपना घर शम्शान बना कर
शहनाई बजवाई मिल में

सारा दिन मेहनत से कूटे
कसी फावड़ा और हथौड़ी
बदले में दी है तो मिल ने
रोटी लेकिन थोड़ी-थोड़ी

पेट नहीं भरता है पूरा
रह जाता है रोज अधूरा
लेकिन अक्सर पानी पूरा
पीकर पेट हिलाते हैं
बुद्धु भैय्या मिल से आकर बिस्तर पर गिर जाते हैं
डण्डी वाला पंखा लेकर घंटों कमर खुजाते हैं
--योगेन्द्र मौदगिल

जय जय जय हो हिंदुस्तान.............

मित्रों आप सभी का आभारी हूं
एक अन्य रचना के साथ पुनः उपस्थित हूं


कामसूत्र कंडोम दिखाता, चैनल युग का टीवी.
बेटा-बेटी आंख फाड़ते, नज़र झुकाती बीवी.
घर के भीतर खुली दुकान...
जय जय जय हो हिंदुस्तान...

ईस्टइंडिया के वंशज़ हैं, सभी कंपनी वाले.
हड़काएंगें तुझको चाहे, जितनी पूंछ हिला ले.
स्वयं की खुद ही कर पहचान...
जय जय जय हो हिंदुस्तान...

सकल क्रान्ति कम्प्यूटर की, बन गयी देसी हलुवा.
नीली फिल्में देख रहे हैं, मिल कर बंटी-ललुवा.
बच्चे सीख गये विग्यान...
जय जय जय हो हिंदुस्तान...

कर्म कला है, कला कर्म है, पैसा इनका संगी.
पैसा ले कर फिरैं, नाचती, बालाएं अधनंगी.
नंगे बेच रहे सामान...
जय जय जय हो हिंदुस्तान...

फिल्म रिलेटिड कम्पीटीशन, हर चैनल पर छाया.
बूढ़ा दद्दू इंस्टीच्यूट में, डांस सीखने आया.
पोते फेंक रहे मुस्कान...
जय जय जय हो हिंदुस्तान...

लिटरेचर में काग़ज़ काले, तन के, मन के दुखड़े.
कविता लिखनी छोड़ लिखो, रे, धारावाहिक मुखड़े.
फिल्मी गीत बने पहचान...
जय जय जय हो हिंदुस्तान...

कैसे-कैसे दांव, दिखा, सकती है रे देवरानी.
धारावाहिक देख-देख कर, सन्न हुई जेठानी.
ससुर जी ढूंढ रहे शम्शान...
जय जय जय हो हिंदुस्तान...

च्यवनप्राश की जगह सजे हैं, चाकलेट के पैकेट.
पंडित्जी भी पूजा करते, पहन के लैदर-जैकेट.
कण-कण छोड़ गये भगवान...
जय जय जय हो हिंदुस्तान...
--योगेन्द्र मौदगिल

बेटियां

रूपम जी और राजीव रंजन के साथ-साथ
उन तमाम कलमवीरों को यह कविता समर्पित करता हूं
जिंन्होंने बेटियों पर अपनी कलम चलाई है

देखियेगा

मां सरीखे प्यार की हैं डाली बेटियां.
पावन जैसे पूजा की हों थाली बेटियां.
बेटे हैं निराले तो निराली बेटियां.
दुर्गा कहीं लक्ष्मी तो काली बेटियां.

वाहेगुरू, गाड और घनश्याम के.
चाहे अल्लाह रटो चाहे जाप राम के.
लेकिन रहे ध्यान हर खासोआम के.
बेटियों के बिन बेटे किस काम के.
बेटों के लिये ही तो संभाली बेटियां.
जगमगाती जैसे हों दीवाली बेटियां.
बेटे हैं निराले तो निराली बेटियां.
दुर्गा कहीं लक्ष्मी तो काली बेटियां.

एक दिन खुद को डुबायेगी दुनिया.
पीट-पीट माथा पछतायेगी दुनिया.
और फिर रो भी नहीं पायेगी दुनिया.
बेटियों के बिन मिट जायेगी दुनिया.
देश व समाज खुशहाली बेटियां.
धरती का गहना भाग वाली बेटियां.
बेटे हैं निराले तो निराली बेटियां.
दुर्गा कहीं लक्ष्मी तो काली बेटियां.

लाख हीरे-मोतियों का रहे सिलसिला.
बेटी का दुलार ना मिला तो क्या मिला.
उस से बड़ा और दुरभाग क्या भला.?
कन्यादान करने को जिसे ना मिला.
बाप के लिये तो भाग वाली बेटियां.
लाडो, गुड्डो, मिट्ठू और लाली बेटियां.
बेटे हैं निराले तो निराली बेटियां.
दुर्गा कहीं लक्ष्मी तो काली बेटियां.

ऊदा, मैना, जूही, भीमाबाई बेटियां.
हजरतमहल, लक्ष्मीबाई बेटियां.
पीटीउषा, लता, तीजनबाई बेटियां.
राष्ट्रपति पाटिल प्रतिभा ताई बेटियां.
कल्पना-सुनीता चांद वाली बेटियां
हमने तो सीने से लगाली बेटियां
बेटे हैं निराले तो निराली बेटियां
दुर्गा कहीं लक्ष्मी तो काली बेटियां
--योगेन्द्र मौदगिल

आजकल के दौर में......................

ज़िन्दगी का क्या भरोसा, आजकल के दौर में..!
रौशनी का क्या भरोसा, आजकल के दौर में..!

दरअसल जब चोट अपने लोग ही देने लगे,
फिर किसी का क्या भरोसा, आजकल के दौर में..!

छल-कपट तो हो गयी है, आजकल फितरत मियां,
आदमी का क्या भरोसा, आजकल के दौर में..!

पांव छूने के बहाने खींचते हैं टांग को,
बन्दगी का क्या भरोसा, आजकल के दौर में..!


लूटने वाले भी धंदे पर निकलते हैं मियां,
चौकसी का क्या भरोसा, आजकल के दौर में..!

अंततः बच्चों की खातिर बेच दी उस ने हया,
बेबसी का क्या भरोसा, आजकल के दौर में..!

गो मिले ना आब तो फिर जहर ही पीने लगे,
तिश्नगी का क्या भरोसा आजकल के दौर में..!

जीत हासिल कर ही लेने की अगर हो फिक्र तो,
बेखुदी का क्या भरोसा आजकल के दौर में..!

टिप्पणी पर ध्यान दोगे कुछ नहीं कह पाऒगे,
टिप्पणी का क्या भरोसा, आजकल के दौर में..!
--योगेन्द्र मौदगिल

संभावनाएं ज़ीरो...............

तीन-चार दिन बाहर था. आज ही पानीपत लौटा हूं. आप सभी की स्नेहासिक्त टिप्पणियां सर-माथे पर.
फिलहाल बिना किसी टीका-टिप्पणी के कुछ पंक्तिंयां इस निवेदन के साथ कि---
(मेरी टिप्पणियां अभी बाधित रहेंगी आप अपना स्नेह बनाये रखें)
समर्पित कर रहा हूं कि:---


शुचिता बची न रुचिता, मानव के आचरण में.
रत हो गये हैं सारे, पर्यावरण-क्षरण में.

दीये, कसोरे, कुल्हड़, कूज़े, गिलास, पत्तल,
पुरखों की थातियां हैं, अब प्लास्टिक शरण में.

वन काट लगती फैक्ट्री, पीवीसी-पोलीथिन की,
संसाधनों का दोहन, वन-गांव-वायु-रण में.

लो थक गयी हैं आंखें, बरखा की बाट जोहते,
आदम की भूमिका है, बारिश के अपहरण में.

कैक्टस तो मुस्कराते, रोती बिचारी तुलसी,
वट-नीम और पीपल, हैं काल की शरण में.

भूमि कटाव सहते, नदियां हुई मरुस्थल,
अंगार होके धरती, दहकी, चरण-चरण में.

उत्थान को चले जो पहुंचे विनाश तक वो,
शैतानियत है केवल, आदम के आवरण में.

है राजनीति नागिन और राजनेता बिच्छु,
अब शेष गालियां हैं, जनता की व्याकरण में.

संभावनाएं ज़ीरो, हैं देश में तो 'मुदगिल',
संभव हो जो बचा लो, बच जाये जो भी कण में.
--योगेन्द्र मौदगिल

रणचण्डी की भेंट चढ़ा दो

बच्चा-बच्चा आज जगा ले अपने स्वाभिमान को.
उठो हिंद के वीर सपूतों, पहचानों-पहचान को.
अपनी पर आकर के बदलो दुनिया के उन्वान को.
बेईमान नहीं समझेगा, जीवन भर ईमान को.
आगे बढ़ कर आग लगा दो नफरत के हैवान को
हिंसा से ही ध्वस्त करो इस हिंसा की दूकान को.
रणचण्डी की भेंट चढ़ा दो पापी पाकिस्तान को....

या तो माफी मांगे या समझे सीमा संधान को.
वरना वो जाकर संभाले अपने कब्रिस्तान को.
समझ गया है चीन समझ है अमरीका-जापान को.
नमन किया है विश्व ने भारत के परमाणु ग्यान को
धता बताऒ ऒसामा-बिन-लादेन के फ़रमान को.
कौन चुनौति देगा बोलो, काली के वरदान को.
रणचण्डी की भेंट चढ़ा दो पापी पाकिस्तान को....

जिस दिन लांघ लिया भारत की सीमा के सम्मान को.
उस दिन ही खंडित कर डाला शिक्षा भरी कुरान को.
एक-एक दिन रहा डोलता यहां-वहां पहचान को.
कोई नहीं बचाने आया पापी के अरमान को.
जान को ले के भागे पट्ठे चोट लगी अभिमान को.
हिंसा, द्वेष, कपट से जन्मी ज़िन्ना की संतान को.
रणचण्डी की भेंट चढ़ा दो पापी पाकिस्तान को....

वीर जवानों की बलि लेने वाले इस अभियान को.
असल की है औलाद तो रखना स्मृति में अवसान को.
भारत मां के वीर लाडले रोक दें हर तूफ़ान को.
गीदड़ टोले की खातिर जब साधें तीर-कमान को.
इसीलिये है सीख यही बस सीमा तने जवान को
भारत मां का आंचल छूने वाले इस शैतान को.
रणचण्डी की भेंट चढ़ा दो पापी पाकिस्तान को....
--योगेन्द्र मौदगिल