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एक छंद फ़क़त आपके लिए........

एक छंद फ़क़त आपके लिए........

बड़े-बड़े बंगले हैं, बंगलों में जंगलें हैं,
जंगलों में बंधे हुए, श्वेत श्वान देख लो..
वक्ष को उघाड़ें और देह को उभारें ऐसे,
फ़िल्मी-मसाले जैसे परिधान देख लो..
हेरोइन, कोनीन, दारू, चरस का फैशन है,
गली-गली अपराधों की दूकान देख लो..
गुटखे व बियर को चाट-चाट 'मौदगिल",
बच्चे सब हो गए है नौजवान देख लो...
---योगेन्द्र मौदगिल

भाई किलर झपाटा को सादर-सप्रेम: .................

भाई किलर झपाटा को सादर-सप्रेम:

जय लाल लंगोटे वाले की..जय बोल दे सोट्टे वाले की..
जय बजरंगी के मान की जय..
जय भारत के सम्मान की जय

जय लाल लंगोटे वाले की..जय बोल दे सोट्टे वाले की..
जय बजरंगी के मान की जय..
जय भारत के सम्मान की जय

ये पहलवान अम्बाले का, ये पहलवान पटियाले का.
ये पहलवान पंजाब का है, इसका मुक्का दोआब का है..
सब इसे देख के डरते हैं, गोरे तो पानी भरते हैं...
ये दांव-पेंच इस के असली, बाकी दुनिया सारी नकली....
जय लाल लंगोटे वाले की..जय बोल दे सोट्टे वाले की..
जय बजरंगी के मान की जय..
जय भारत के सम्मान की जय

ये दूर विदेशों में लड़ते, ये परदेसों में भी लड़ते.
इन के ही चर्चे दुनिया में, इन की ही जय-जय दुनिया में..
दुनिया में बड़ा अचम्भा है, ये पहलवान क्या खम्बा है...
ये भीम का भाई लगता है, ये गदा उठा कर सजता है....
जय लाल लंगोटे वाले की..जय बोल दे सोट्टे वाले की..
जय बजरंगी के मान की जय..
जय भारत के सम्मान की जय

थी भारी भीड़ अखाड़े में, चन्दन चाचा के बड़े में.
वहां धोबी-पाट का मेला है, कुश्ती-कुश्ती का खेला है..
यहाँ किलर-झपटा बनते हैं, मंगोल यहीं पर तनते हैं...
है दारासिंह का नाम यहाँ, है कीन्ग्कोंग का गाम यहाँ....
जय लाल लंगोटे वाले की..जय बोल दे सोट्टे वाले की..
जय बजरंगी के मान की जय..
जय भारत के सम्मान की जय

जय बोल यहाँ हरियाणे की, जय दूध-दही के खाणे की.
जै दिल्ली की कश्मीर की जै, जै गंगा-सागर तीर की जै..
जय भोली-भली हीरों की, जय देश के सारे वीरों की...
जय राजस्थान की माटी की, जय दंगल की परिपाटी की....
जय लाल लंगोटे वाले की..जय बोल दे सोट्टे वाले की..
जय बजरंगी के मान की जय..
जय भारत के सम्मान की जय

ये धरती वीर-जवानों की, अलबेलों की-मस्तानों की.
विज्ञानी और किसानों की, ये धरती है परवानों की..
है बच्चा-बच्चा वीर यहाँ, हर पहलवान महावीर यहाँ...
यहाँ रोज अखाड़े सजते हैं, बम-बम के नारे बजते हैं....
जय लाल लंगोटे वाले की..जय बोल दे सोट्टे वाले की..
जय बजरंगी के मान की जय..
जय भारत के सम्मान की जय
--योगेन्द्र मौदगिल

तुम श्लील कहो अश्लील कहो.....

तुम श्लील कहो अश्लील कहो.....


एड्स विश्व की
सर्वाधिक विकृत बीमारी है
किन्तु फिर भी
सारा विश्व इसका आभारी है
क्योंकि जिस दिन डाक्टर
इस का इलाज जान लेंगे

तो ये कमबख्त दुनिया वाले

इसे भी :स्टेटस-सिम्बल' मान लेंगे.....

अपनी कारगुजारियां और तजुर्बे
मित्रों के गिरोह में बतियाएंगे
गोष्ठियों में इस तरह अनुभव सुनाएँगे
एक कहेगा कि
मैं डेढ़ सौ इस्त्रियों के साथ सो चूका हूँ
दूसरा कहेगा
अबे चुप्प
मैं तीन सौ लौंडो को धो चुका हूँ
तीसरा ठहाके से मुस्कुराएगा
और चौड़ा हो कर सुनाएगा
कि हमारा तजुर्बा
सब से भारी है
अरे
तुम को सेक्स के बारे में कुछ भी नहीं आता है
हमें देखो
हम सीधा स्वर्ग कि सैर कर के आता है
क्योंकि सुबह सेक्स करता है
शाम को सेक्स करवाता है..
** योगेन्द्र मौदगिल

नोट :- नीले रंग में कम्पोज भाग  पूर्व प्रकाशित है इस से आगे कम्पोज काली पंक्तियाँ सानुरोध प्रकाशित हैं.

स्टेटस-सिम्बल'

लघु-व्यंग्य

स्टेटस-सिम्बल'

एड्स विश्व की
सर्वाधिक विकृत बीमारी है
किन्तु फिर भी
सारा विश्व इसका आभारी है
क्योंकि जिस दिन डाक्टर
इस का इलाज जान लेंगे
तो ये कमबख्त दुनिया वाले
इसे भी
:स्टेटस-सिम्बल' 
मान लेंगे.....
 इसे भी स्टेटस-सिम्बल' मान लेंगे.....

** योगेन्द्र मौदगिल 
नोट :- दरअसल ये कविता यहीं पर समाप्त नहीं होती. 
कुछ विकृति-चित्रण और भी अनायास ही हो गया...
मित्र-मण्डली ने पसंद तो किया पर भाव में हल्की अश्लीलता की मोहर भी लगा दी.....
आप सब सुधि पाठकों पर निर्णय छोड़ता हूँ कि 
इस कविता का शेष भाग प्रकाशित करूं या नहीं.....?

दो ताउओं के बीच में ..........

दो ताउओं के बीच में

कल यानि १९ फ़रवरी को जब मैं 
भगवान महावीर फौन्डेशन, जगदीशपुर के कवि सम्मेलन 
में था तो दो उल्लेखनीय फोन आए. पहला फोन भाई अंतर सोहिल का था. जो ताऊ मिलन देखने के लिए इतने रोमांचित हैं कि उन्होंने अपना रिजर्वेशन भी करवा लिया..आप सब इसलिए रोमांचित हो सकते हैं कि दो ताउओं के बीच में ये छोरा ....?


दूसरा फोन रस-सिद्ध कवयित्री व्यंजना शुक्ला का था जिसमे १२ मार्च के हरदोई (उ प्र) के विराट कवि सम्मेलन का आमंत्रण था. सो अब १२ मार्च को हरदोई रहूँगा. वहां के ब्लागर बंधु नोट करें. 


आज करनाल क्लब, करनाल में 
अखिल भारतीय साहित्य परिषद् का कवि सम्मेलन 
और साहित्यकार सम्मान समारोह है जिसमे खाकसार को 
श्री प्यारेलाल उप्पल स्मृति सम्मान से अलंकृत किया जाएगा. 


तो अब समय है कि आप सबके लिए कुछ पंक्तियाँ 

देखिएगा कि 

मैं हूँ औरत मेरी तो बस ये कथा
पीर, आंसू, शोक, शोषण और व्यथा

मैं भी तेरे पेट से जन्मी थी माँ
मुझमे और भैया में फिर क्या फर्क था

पीट कर पत्नी को पौरुष तृप्त क्यों
इस प्रश्न ने अक्सर ही माथे को मथा

हमने तो हर दौर में पाया यही
झूठ आवश्यक है, सच तो है वृथा

श्रंखलाबद्ध हो गई है "मौदगिल"
उफ़ ! कलंकित भ्रूण हत्या कि प्रथा
--योगेन्द्र मौदगिल 



( डाक्टर नूतन जी, संगीता स्वरुप जी, डाक्टर दाराल जी, 
भारतीय नागरिक जी, सतीश सक्सेना जी, काजल कुमार जी, 
कुंवर जी, प्रवीण पाण्डे जी, श्रीमती आशा जोगलेकर जी, 
मनोज मिश्र जी, अभिषेक जी और नीरज गोस्वामी जी 
आप सब का स्नेह ही मेरी पूँजी है...इसे बनाए रखें...

समीर लाल जी, रविन्द्र प्रभात जी 
आप की राम-राम गरंटेड पहुँच जाएगी...

नरेश राठोड जी चिंता न करे 
ये ताऊ बड़े ताऊ के घर का रास्ता भूलने वाला नहीं है

सुनील गज्जानी जी
बीकानेर जल्दी ही आरहा हूँ..
आपका स्वास्थ्य कैसा है...?

धीरू भाई 
मिलना पक्का......
और भाटिया जी 
एक दर्जन जर्मन लट्ठ जल्दी से भिजवा दो 
ताई को देने हैं ताऊ के वास्ते 

और प्रिय अंतर सोहिल 
तुम्हारी संवेदना को नमन करता हूँ.)



माटी-वंदना से बड़ी कोई वंदना नहीं है............

विलंबित प्रणाम स्वीकारें और एक छंद पढ़ें

चन्दन, तिलक, रौली, हल्दी, सिन्दूर-
श्रृंगार श्रृंखलाओं को उठा-उठा के झूमिये.

प्राण, देह, धन, अभिमान, यश, गौरव की,
गाथाओं को भले आप रोज-रोज चूमिये.

पीर व् फकीर, साधू-संत, देवी-देवताओं,
भूत व् भविष्य को घुमा-घुमा के घूमिये.

माटी-वंदना से बड़ी कोई वंदना नहीं है,
इसी वंदना को बस गाते-गाते झूमिये..
-- योगेन्द्र मौदगिल

पूरा देश कहीं हिजड़ा तो नहीं हो गया ......

प्रिंट मीडिया
हो या इलेक्ट्रोनिक मीडिया
ख़बरों का संसार
टीवी या अखबार
कुछ भी देख लो मेरे यार
विज्ञापनों ने बदल दी देश की हवा
एनलार्ज, ब्रेस्ट टोनर, उभार और उभारने की दवा
विज्ञापनों कि रेल-पेल
एनर्जिक ३१, सांडा, मस्त कलंदर, जापानी तेल
इन सबको इतनी मात्रा में इतने विस्तार में
पढ़ कर लगता है
देश का पुरुषार्थ कहीं खो गया
और पूरा देश कहीं हिजड़ा तो नहीं हो गया
और शायद हो ही गया है
तभी तो कोई मुंह नहीं खोलता
भरे चोराहे पर हत्या हो जाये या बलात्कार
भरे दफ्तर रिश्वत का गरम बाज़ार
भरे घर में दहेज़ हत्या, भ्रूण हत्या,
गालियां मंडित अनाचार
कोई कुछ नहीं बोलता
कोई कुछ नहीं बोलता
--योगेन्द्र मौदगिल

ऐसा भी क्या....

कंकरीट के चौबारे में, अद्भुत है नक्कासी.

रौशनदान में अटकी चिड़िया, मर गई भूखी प्यासी..



इतनी सुविधा के हित खरचा-चर्चा चौबीस घंटे.

दिन में गाहक, रात फैक्टरी, भैय्या के सब टंटे..



बाबा भेज दिये भैय्या ने उल्टे पैरौं गांव,

मैली छत की हंसी उड़ाती, बरसाती की छांव..



चौबारे पर बैठी भाभी चौराहे को ताके,

मूस-बिलौटे घर में खेलें कुत्ते भीतर झांके..



घर का पाहुन दरवाज़े की घंटी नहीं बजावै.

देख के महरी दांत भीच कै मंद मंद मुस्कावै..



बच्चे गये बोर्डिंग घर में सहज सखि-सम्मेलन.

ताश-तंबोला धुर सारा दिन, जुल्मी किट्टी फैशन..



देवर दुश्मन लगे रे भैय्या, ननदी लगे चुड़ैल.

मन के भीतर-घर के भीतर, भरा उफनता मैल..



ऐसा भी क्या घर होता है होश संभाली सोचा ?

घर को घर कहने से पहले मन सारा दिन लोचा..

 
--योगेन्द्र मौदगिल



भारती के चित्र पे लहू की धारियां...

इधर हरियाणा में विधानसभा भंग हो गई. एकाध दिन में चुनावों की तिथि भी घोषित हो जायेगी. चाहता था कुछ चुनावी छंद प्रस्तुत करूं.... लेकिन उनसे पूर्व आप सब के लिये एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूं.... शायद अच्छा लगे... प्रतिक्रिया अपेक्षित...



उपवन की जिनपे थी जिम्मेवारियां.
वही लिये फिरते हैं अब आरियां.
देश में बढ़ी यें कैसी दुश्वारियां----भारती के चित्र पे लहू की धारियां..

गिल्ली-डंडे वाले हाथ पीयें सिग्रेट.
गंगाजल की जगह हैं बीयर के क्रेट.
नारी का सम्मान अब बन गया रेट.
पश्चिम समान हुये हम भी अपटूडेट.
जानकी के देश बिकती हैं नारियां,
औरत के भाग्य लिखी सिसकारियां.
देश में बढ़ी यें कैसी दुश्वारियां----भारती के चित्र पे लहू की धारियां..

बैंक-बीमा इस्ट्राइक का करते हैं शोर.
ठगों की जमात का है शैयरों पै जोर.
एक जैसे लगते हैं पुलिस व चोर.
बहूरूपिये हैं सारे देखो जिस ऒर.
देश खाने की भी लगती हैं बारियां,
नाम लोकतंत्र काम है मक्कारियां.
देश में बढ़ी यें कैसी दुश्वारियां----भारती के चित्र पे लहू की धारियां..

माइक के माहिरों से कौन है बचा.
राम की कथा हो चाहे वेदों की ऋचा.
पेट भरने के लिये शोर है मचा.
राम-राम, कृष्ण-कृष्ण हो या चाचाचा.
धरम की धंदे से हैं भागीदारियां,
कीचड़ से भरी रहें पिचकारियां.
देश में बढ़ी यें कैसी दुश्वारियां----भारती के चित्र पे लहू की धारियां..

बच्चों में सरस भाव भरिये जनाब.
बहू-बेटियों का मान करिये जनाब.
टेलीविजन से पर डरिये जनाब.
घर को बाज़ार मत करिये जनाब.
आप ही के कांधों पे है जिम्मेवारियां,
आंगन में गूंजने दो किलकारियां.
देश में बढ़ी यें कैसी दुश्वारियां----भारती के चित्र पे लहू की धारियां..
देश में बढ़ी यें कैसी दुश्वारियां----भारती के चित्र पे लहू की धारियां..
--योगेन्द्र मौदगिल