आज पानीपत में कवि -सम्मेलन हैं.
आज के संयोजकीय तनाव से उबर कर कल से नार्मल हो जाऊंगा.
इसके बाद भी कुछ दिन छुट्टी रहेगी
१६ से १९ माँ वैष्णो देवी के दर्शनार्थ यात्रा पर रहूँगा
पानीपत सांस्कृतिक मंच के टोले के साथ.
२० को कविता वाचक्नवी जी से पानीपत में भेंट रहेगी.
२४ से ३० तक गोरखपुर, मुंबई, सिलवासा की
कविसम्मेलनीय यात्राएं.
इस बीच जहाँ भी वक़्त मिला आप सब से मिलता रहूँगा..
बहरहाल कई दिनों के बाद
आज वक़्त है कि
एक ग़ज़ल आप सब की खिदमत में पेश करूं.
इसलिए फिलहाल आप ग़ज़ल का आनंद लें
और बताएं कैसी लगी.......
कि
ज़रा सी बात पर जो आना-जाना छोड़ देते हैं.
सुहाने ख्वाब मस्ती के भी आना छोड़ देते हैं.
कसम से सिरफिरेपन की भी कोई हद्द नहीं होती,
ज़माना छोड़ने वाले ज़माना छोड़ देते हैं.
ये पंछी और बनजारे फितरतन एक जैसे हैं,
अगर दाना नहीं मिलता ठिकाना छोड़ देते हैं.
वृद्धाश्रम तामीर करने की सनक में लोग,
घर में माँ-बाप से मिलना-मिलाना छोड़ देते हैं.
ये शीशों के महल वालों के जलवे ही निराले हैं,
ये पत्थर बाँट कर बत्ती बुझाना छोड़ देते हैं.
--योगेन्द्र मौदगिल