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मैंने हार नहीं मानी............

कुछ पंक्तियाँ किसी के लिए......
रिश्तों पर इलज़ाम सहे.
प्रेम के ढेरों नाम सहे..

दुनिया भर से यारी में,
दुश्मन आठों याम सहे..

उस की मर्ज़ी वो जाने,
हम ने चारों धाम सहे..

तेरी-मेरी हस्ती क्या,
मीरा ने घनश्याम सहे..

दूर बहुत फल 'पूजा का,
दर्द बहुत गुलफाम सहे.

मैंने हार नहीं मानी,
मैंने तो अंजाम सहे..
--योगेन्द्र मौदगिल

भ्रष्टाचार मिटाना है..................

घूंघट के पट खोल सखे. 
अन्ना-अन्ना बोल सखे..

भ्रष्टाचार मिटाना है, 
बात यही अनमोल सखे..

अचरज से सब देख रहे, 
सत्ता डांवाडोल सखे..

बच्चा-बच्चा फोड़ेगा, 
इन लुच्चों का ढोल सखे..

लोकपाल बिल लाएँगे, 
बम-बम, बम-बम बोल सखे..

चलो 'मौदगिल' अनशन पर, 
ले कविता रमझोल सखे..
--योगेन्द्र मौदगिल

सविता भाभी सबसे ज्ञानी लगती है.......

दारुबाज़ी उन्हें सुहानी लगती है.
लालपरी ही रात की रानीलगती है..

जान गए हम मनमोहन की लीला को,
उन्हें सोनिया ही महारानी लगती है..

जिन को बीवी लगती बोरिंग लघुकथा,
उन्हें पड़ोसन मस्त कहानी लगती है..

इंटरनेट के देवर ये महसूस रहे,
सविता भाभी सबसे ज्ञानी लगती है..

दांव-पेंच दुनिया के सारे सीख लिए,
चाँद पे बैठी बुढ़िया कानी लगती है..

आँख पे चश्मा, मूंह पर पट्टी है जालिम,
आज़ादी भी ऐंच-कतानी लगती है..

सूरज-चंदा-तारे प्यारे लगते हैं,
आदम को धरती बेगानी लगती है..

जब से  रिश्ता खुराफात से जोड़ लिया,
रीत प्यार की उन्हें पुरानी लगती है..
-- योगेन्द्र मौदगिल 

 २४ जुलाई २०११ को दिल्ली राज्य ब्राह्मण  सभा ने 
प्रतिभा पूजन समारोह किया था..प्रस्तुत दोनों चित्र वहीँ के हैं...

चार पैसे कमा लिये उसने........

चार पैसे कमा लिये उसने.
यार अपने गँवा लिये उसने.

बाज़ से वायदा-फरोशी में,
छत पे पंछी बुला लिये उसने.

अपना साया तलक भी हार गया,
फिर भी पत्ते बिछा लिये उसने.

आज कोई नया शिगूफा है,
लोग इतने बुला लिये उसने.

फिर से इक मोड़ है कहानी में,
फिर से किस्से उठा लिये उसने.

रात भर करवटों से यारी थी,
फिर भी सपने बुला लिये उसने.

लोग कहते रहेंगे, कहने दो,
और शीशे चढ़ा लिये उसने.

भेद चमड़ी का जान कर 'मुदगिल"
सारे सिक्के चला लिये उसने.
--योगेन्द्र मौदगिल 


मेरा खुद से ही वास्ता गुम है................

बातों से यार, फलसफा गुम है.
मेरा खुद से ही वास्ता गुम है.

मेरी आंखों में खोज ले उस को,
फिर न कहना यहां खुदा गुम है.
मौन पीपल है, चुप है मौलशिरी,
इस कदर सांझ से हवा गुम है.

दरमियानी सी सांवली छोरी,
कितनी खुश है कि आईना गुम है.

लोग विग्यापनों को बांच रहे,
मानो खबरों से वाकया गुम है.

दक्षिणा, चंदा-दान आश्रम का,
यही मुखरित है बस कथा गुम है.

लड़कियों ने बदल लिये चश्मे
बाप कहता है कि हया गुम है

मुआ जोबन है 'मौदगिल' बैरी,
गुम हैं गलियां तो रास्ता गुम है.
--योगेन्द्र मौदगिल

चार चमचे, चार चाकू, डार्लिंग..................

चार चमचे, चार चाकू, डार्लिंग.
यार हैं सारे हलाकू, डार्लिंग.

पूत की कम्प्यूटरी चैटिंग भरी,
हम समझते थे पढ़ाकू, डार्लिंग.

पाक दामन अब भला किसका रहा,
नापाक हैं पट्ठे लड़ाकू, डार्लिंग.

सारी आंटी, सारे अंकल हो गये,
ताई, बूआ, मामू, काकू, डार्लिंग.

पहन ली खादी, खुदा को खो दिया,
हो गये हिजड़े भी डाकू, डार्लिंग.
--योगेन्द्र मौदगिल


प्यार के प्रतीक ढूंढना...............

जब भी कोई लीक ढूंढना.
प्यार के प्रतीक ढूंढना.

जि़न्दगी है लंबा सफ़र,
साथ ठीक-ठीक ढूंढना.

कोई जल्दबाज़ी नहीं,
दुश्मनी सटीक ढूंढना.

कल्पना में हिंद-कुश रहे,
अब ना रोमां-ग्रीक ढूंढना.

पत्थरों से दोस्ती हो तो,
मेरे सा हक़ीक ढूंढना.

प्रेम-धागा खो गया कहीं,
ध्यान से बारीक़ ढूंढना.
--योगेन्द्र मौदगिल


बच्चियां अब बड़ी हो गयीं.............

घर में चिन्ता खड़ी हो गयीं.
बच्चियां अब बड़ी हो गयीं.

फूल हैरान हैं आजकल,
तितलियां सरचढ़ी हो गयीं.

इंद्र जैसी हुई कामना,
इंद्रियां उर्वशी हो गयीं.

बात-बातों में ढहने लगी,
बस्तियां भुरभुरी हो गयीं.

सुखनवर हो गया लो शह्र,
फिर नशिस्तें खरी हो गयीं.

पत्ते झड़ने लगे शाख से ,
वेदनाएं हरी हो गयीं.

पेट भरता नहीं 'मौदगिल',
बाजुएं अधमरी हो गयीं.
--योगेन्द्र मौदगिल

आज फिर इक गुनाह कर लूँगा......

एक टाइम - पास प्रयास
आज फिर इक गुनाह कर लूँगा.
तुझ को देखूंगा, आह कर लूँगा.

मैं शिवाले मैं चाह कर लूँगा.
आँख मूंदूंगा, वाह कर लूँगा.

मेरी आँखों में डूब जाओ तो
खुद को मैं बे-पनाह कर लूँगा.

भर नज़र देखना चरागों को,
मैं हवाओं में राह कर लूँगा.

एक मुद्दत से भूख है शायद,
मैं बदन को सियाह कर लूँगा.

'मौदगिल' मौज मुद्दआ मेरा
यों फकीरी को शाह कर लूँगा.
--योगेन्द्र मौदगिल

एक ग़ज़ल अंतर सोहिल के नाम


नई गुदगुदी में प्रकाशित
मेरी एक ग़ज़ल
अंतर सोहिल के नाम

करते-करते ब्लागिंग भैया ये तो टेढ़ा काम किया.
तुमने पीकर ले अंगड़ाई मुफ्त हमें बदनाम किया.

साथ-साथ ये बतला देते तो भी कितना अच्छा था,
दिन में ही कर डाला सब कुछ या सुबहो या शाम किया..

सभी पडौसी बहुत सजग हैं चूँ-चूँ सुन बतला देंगे,
खटिया पर आराम किया है या फिर तुमने काम किया...

रोड-जाम में जाम खींचने वाली हरकत कर डाली,
भैस को बीवी समझ के जालिम पूँछ पकड़ परनाम किया....

मधुशाला की मधुबाला की मस्ती में जब यार रमे,
हाय वोदका, हाय री वाइन, रम-रम, रम-रम राम किया.....

चलो "मोदगिल" किस्सा छोडो अंतर जी भी मान गए,
ग़ज़ल भी होली, पोस्ट भी होली, सारा काम तमाम किया......
--योगेन्द्र मौदगिल

दो ताउओं के बीच में ..........

दो ताउओं के बीच में

कल यानि १९ फ़रवरी को जब मैं 
भगवान महावीर फौन्डेशन, जगदीशपुर के कवि सम्मेलन 
में था तो दो उल्लेखनीय फोन आए. पहला फोन भाई अंतर सोहिल का था. जो ताऊ मिलन देखने के लिए इतने रोमांचित हैं कि उन्होंने अपना रिजर्वेशन भी करवा लिया..आप सब इसलिए रोमांचित हो सकते हैं कि दो ताउओं के बीच में ये छोरा ....?


दूसरा फोन रस-सिद्ध कवयित्री व्यंजना शुक्ला का था जिसमे १२ मार्च के हरदोई (उ प्र) के विराट कवि सम्मेलन का आमंत्रण था. सो अब १२ मार्च को हरदोई रहूँगा. वहां के ब्लागर बंधु नोट करें. 


आज करनाल क्लब, करनाल में 
अखिल भारतीय साहित्य परिषद् का कवि सम्मेलन 
और साहित्यकार सम्मान समारोह है जिसमे खाकसार को 
श्री प्यारेलाल उप्पल स्मृति सम्मान से अलंकृत किया जाएगा. 


तो अब समय है कि आप सबके लिए कुछ पंक्तियाँ 

देखिएगा कि 

मैं हूँ औरत मेरी तो बस ये कथा
पीर, आंसू, शोक, शोषण और व्यथा

मैं भी तेरे पेट से जन्मी थी माँ
मुझमे और भैया में फिर क्या फर्क था

पीट कर पत्नी को पौरुष तृप्त क्यों
इस प्रश्न ने अक्सर ही माथे को मथा

हमने तो हर दौर में पाया यही
झूठ आवश्यक है, सच तो है वृथा

श्रंखलाबद्ध हो गई है "मौदगिल"
उफ़ ! कलंकित भ्रूण हत्या कि प्रथा
--योगेन्द्र मौदगिल 



( डाक्टर नूतन जी, संगीता स्वरुप जी, डाक्टर दाराल जी, 
भारतीय नागरिक जी, सतीश सक्सेना जी, काजल कुमार जी, 
कुंवर जी, प्रवीण पाण्डे जी, श्रीमती आशा जोगलेकर जी, 
मनोज मिश्र जी, अभिषेक जी और नीरज गोस्वामी जी 
आप सब का स्नेह ही मेरी पूँजी है...इसे बनाए रखें...

समीर लाल जी, रविन्द्र प्रभात जी 
आप की राम-राम गरंटेड पहुँच जाएगी...

नरेश राठोड जी चिंता न करे 
ये ताऊ बड़े ताऊ के घर का रास्ता भूलने वाला नहीं है

सुनील गज्जानी जी
बीकानेर जल्दी ही आरहा हूँ..
आपका स्वास्थ्य कैसा है...?

धीरू भाई 
मिलना पक्का......
और भाटिया जी 
एक दर्जन जर्मन लट्ठ जल्दी से भिजवा दो 
ताई को देने हैं ताऊ के वास्ते 

और प्रिय अंतर सोहिल 
तुम्हारी संवेदना को नमन करता हूँ.)



ज़माना छोड़ देते हैं.........

आज पानीपत में कवि -सम्मेलन हैं.
आज के संयोजकीय तनाव से उबर कर कल से नार्मल हो जाऊंगा.

इसके बाद भी कुछ दिन छुट्टी रहेगी
१६ से १९ माँ वैष्णो देवी के दर्शनार्थ यात्रा पर रहूँगा 
पानीपत सांस्कृतिक मंच के टोले के साथ.

२० को कविता वाचक्नवी जी से पानीपत में भेंट रहेगी.

२४ से ३० तक गोरखपुर, मुंबई, सिलवासा की
कविसम्मेलनीय यात्राएं.

इस बीच जहाँ भी वक़्त मिला आप सब से मिलता रहूँगा..



बहरहाल कई दिनों के बाद 
आज वक़्त है कि 
एक ग़ज़ल आप सब की खिदमत में पेश करूं.

इसलिए फिलहाल आप ग़ज़ल का आनंद लें 
और बताएं कैसी लगी.......



कि

ज़रा सी बात पर जो आना-जाना छोड़ देते हैं.
सुहाने ख्वाब मस्ती के भी आना छोड़ देते हैं.

कसम से सिरफिरेपन की भी कोई हद्द नहीं होती,
ज़माना छोड़ने वाले ज़माना छोड़ देते हैं.

ये पंछी और बनजारे फितरतन एक जैसे हैं,
अगर दाना नहीं मिलता ठिकाना छोड़ देते हैं.

वृद्धाश्रम तामीर करने की सनक में लोग,
घर में माँ-बाप से मिलना-मिलाना छोड़ देते हैं.

ये शीशों के महल वालों के जलवे ही निराले हैं,
ये पत्थर बाँट कर बत्ती बुझाना छोड़ देते हैं.
--योगेन्द्र मौदगिल

अंधे बाबा का हर गाना दुनिया में. .......

रीत पुरानी, नया ज़माना दुनिया में.
जिस का जैसा ठौर-ठिकाना दुनिया में..

क्या रोना, क्या हँसना-गाना दुनिया में.
संघर्षों का दौर पुराना दुनिया में..

सारी दुनिया आँख मूँद कर सुनती है,
अंधे बाबा का हर गाना दुनिया में.

कहीं मिला लंगोट, कहीं ताबूत मिला,
गज़ब है उसका ताना-बाना दुनिया में.

संबंधों पर उसने दांव लगा डाले,
सारे कहते खेल पुराना दुनिया में.

जुगनु, तारे. चंदा, सूरज उनके हैं,
अपना तो भई, है वीराना दुनिया में.

कब तक, आखिर कब तक हम भरमाएंगे,
वही एक सा आना-जाना दुनिया में.
--योगेन्द्र मौदगिल

चोर-चोर मोसेरे भाई..

२ अक्टूबर  को सोनीपत में कवि सम्मलेन कम मुशायरा था. रियासत अली ताबिश (कैराना), तरुण सागर व् मेघा कसक (सहारनपुर), विनोद पाण्डेय (नोएडा), मैं याने योगेन्द्र मौदगिल पानीपत से व आदिक भारती, विकास शर्मा राज व देस राज कैफ सहित ढेर सारे स्थानीय शायर. 

विनोद पाण्डेय सुबह ही पानीपत मेरे पास आ गए थे. बेटा दिवाकर उनसे कंप्यूटर से सम्बंधित कुछ न कुछ पूछता ही रहता है सो उसी का प्रमाण रहा ये बरसों पुराना विडिओ . लेकिन अब चूंकि  बेटे को विडिओ डालना आ गया है तो डलते ही रहेंगे. बहरहाल बरेली यात्रा विवरण अभी बाकि है.....

मगर मन है की आप एक रचना पढ़ लें. 

तो लीजिये 


तू उनका वो तेरे भाई.
चोर-चोर मोसेरे भाई..

आग से रिश्तेदारी हो तो,
क्या मंदिर, क्या डेरे भाई..

प्यादे अफलातून हैं अब तो,
रहते आँख तरेरे भाई..

पलकें गायब, पुतली टेढ़ी,
सपने कौन  उकेरे  भाई..

देख उजाले लूट रहे हैं,
सहलाते अँधेरे भाई..

मेरा नंबर ज़ेहन में रखना
आफत जब भी घेरे भाई..

न दाना ना रहे कबूतर,
शेष गरम मुंडेरे भाई..

कज़न के माने सजन "मौदगिल",
बिन फेरे हम तेरे भाई..
--योगेन्द्र मौदगिल

बाबू जी .....

आज कोई दोहा याद नहीं आ रहा 
एक मतला और एक शेर देखें 
कि

  बातें झूठी, मन भी झूठा, दुनिया झूठी बाबू जी 
फिर भी जाने क्या है ससुरी लगे अनूठी बाबू जी

राजनीत का खेल खेलने वाले हैं दुष्यंत यहाँ 
किस्मत देखो शकुंतला कि गिरी अंगूठी बाबू जी 
--योगेन्द्र मौदगिल 

जिन्दगी की ज़ंग का अभ्यास तो जाता रहा....

उन्मुक्तता बढ़ती गयी, उल्लास तो जाता रहा.

बेचारगी के दौर में विश्वास तो जाता रहा.




खोखलापन हो गया हावी बदन पर दोस्तों,

जिन्दगी की ज़ंग का अभ्यास तो जाता रहा.




दोस्ती के बोल, रिश्तेदारियों के फलसफे,

समझा हूं तब से नेह का आभास तो जाता रहा.




आज की तक़दीर अपने हाथ से लिक्खी मगर,

इसके अनुगत वंश का इतिहास तो जाता रहा.




क़द ही नहीं क़िरदार से भी लोग बौने हो गये,

झड़ गये पत्ते सभी मधुमास तो जाता रहा.




चार ईंटे, चार पैसे जब से अपने हो गये,

शर्म का फिर 'मौदगिल' एहसास तो जाता रहा.

--योगेन्द्र मौदगिल

छोरियां क्या से क्या हो गयी............

ज़िन्दगी इक व्यथा हो गयी.

प्रीत की दुर्दशा हो गयी.



देखते, देखते, देखते...

ज़िन्दगी क्या से क्या हो गयी.



आया तूफ़ान महंगाई का,

सारी खुशियां हवा हो गयी.



पीड़ा इतनी बढ़ी अंततः,

कुल दिनों की दवा हो गयी.



मूं छिपाती फिरै मुफ़लिसी,

लो अमीरी अना हो गयी.



देख टीवी को अम्मा कहे,

छोरियां क्या से क्या हो गयी.



पहले होती थी इंसानियत,

आजकल गुमशुदा हो गयी.

--योगेन्द्र मौदगिल

कुछ सुनती, कुछ कहती बातें........

कुछ सुनती, कुछ कहती बातें.

खामोशी से बहती बातें.




हाय, ज़माना देख-देख कर,

मन भीतर ही रहती बातें.



सच कहना तो मुश्किल है भई,

मुझको अक्सर कहती बातें.



उन्हें समझना कठिन नहीं रे,

सीमा में जो रहती बातें.



ज्वालामुखी फूटता है तब,

जब बातों को सहती बातें.



सुन कर हवा-हवाई चरचे,

खुले थपेड़े सहती बातें.



बात-बात में कही 'मौदगिल',

बातों में जो रहती बातें.

--योगेन्द्र मौदगिल

मैं हूं औरतज़ात, है मेरा........

लीजिये संडे है आज
समझ में नहीं आ रहा है कि क्या लिखूं
दिमाग भी लगता है छुट्टी पर है



फिर भी आदतन कुछ पुरानी पंक्तियां
प्रस्तुत करता हूं





काग़ज़, कलम, दवात का रिश्ता
समझो तो जज्ब़ात का रिश्ता



मैं हूं औरतज़ात, है मेरा
भरे उजाले, रात का रिश्ता



मजदूरी, क्या मांग ली बंधु
हो गया घूंसे-लात का रिश्ता



वक्त-वक्त का खेल है प्यारे
कूप से झंझावात का रिश्ता



घर भी मायानगरी जैसे
हर रिश्ता है घात का रिश्ता



जब तक है अनुराग चलेगा
'मुदगिल' दिल की बात का रिश्ता
--योगेन्द्र मौदगिल

मरा सभी की आंख का पानी..........

बिग-बी, राखी, एकता रानी
घर-घर की बस यही कहानी

टेली-वीज़न देख-देख कर
बच्चों पर चढ़ रही जवानी

सास बनी है बास अगर तो
बहू स्वयंभू है पटरानी

नाती-पोते कम्प्यूटर के
देख फालतू दादी-नानी

विग्यापन भी कैसे-कैसे
मरा सभी की आंख का पानी

जिस को देखो वो ही नंगा
गये कुएं में राजा-रानी

सारे बंदर मस्त कलंदर
तेल तलक सारे जापानी

देख ज़माना कैसा आया
दूध हवाले बिल्ली रानी

खेल-खेल में शेर हो गये
कुछ बा-मानी कुछ बे-मानी

यार 'मौदगिल' सोच बदल ले
पके बाल है उम्र सयानी
--योगेन्द्र मौदगिल