घर में चिन्ता खड़ी हो गयीं.
बच्चियां अब बड़ी हो गयीं.
फूल हैरान हैं आजकल,
तितलियां सरचढ़ी हो गयीं.
इंद्र जैसी हुई कामना,
इंद्रियां उर्वशी हो गयीं.
बात-बातों में ढहने लगी,
बस्तियां भुरभुरी हो गयीं.
सुखनवर हो गया लो शह्र,
फिर नशिस्तें खरी हो गयीं.
पत्ते झड़ने लगे शाख से ,
वेदनाएं हरी हो गयीं.
पेट भरता नहीं 'मौदगिल',
बाजुएं अधमरी हो गयीं.
--योगेन्द्र मौदगिल