खरगोन के कवि सम्मेलन के लिए
आज रात हजरत निजाम्मुद्दीन से ट्रेन पकडूँगा.
अंतर सोहिल भी साथ रहेंगे.
खरगोन से लौटते हुए वापसी में इंदोर......
भाटिया जी के जर्मन लट्ठ ताई तक भिजवाने की जिम्मेवारी
हमारी है...और हम पहुंचा कर आएँगे....
भाटिया जी निश्चिन्त रहें..
फिलहाल आज की पोस्ट के नाम पर एक गीत संभालिये
मौसम कितने रंग बदलता है...
पल-पल रंग बदलता मौसम
ऋतुओं को भी छलता मौसम
सावन की रिश्तेदारी में भीग-भीग कर जलता है
मौसम कितने रंग बदलता है...
कहीं-कहीं दिलवाला मौसम
और कहीं पर काला मौसम
आह्ट का बहकावा देकर धरती माँ को छलता है
मौसम कितने रंग बदलता है...
कहीं छावं सा प्यारा मौसम
कहीं धुप का मारा मौसम
प्रीत की गर्मी में तो तपता मगर विरह में गलता है
मौसम कितने रंग बदलता है...
किसी को अश्रुजल सा मौसम
किसी को गंगाजल सा मौसम
अपनी मनमानी के चर्चे करता और उछलता है
मौसम कितने रंग बदलता है...
--योगेन्द्र मौदगिल