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भाटिया जी निश्चिन्त रहें..

खरगोन के कवि सम्मेलन के लिए 
आज रात हजरत निजाम्मुद्दीन से ट्रेन पकडूँगा. 
अंतर सोहिल भी साथ रहेंगे. 
खरगोन से लौटते हुए वापसी में इंदोर......
भाटिया जी के जर्मन लट्ठ ताई तक भिजवाने की जिम्मेवारी 
हमारी है...और हम पहुंचा कर आएँगे....

भाटिया जी निश्चिन्त रहें..

फिलहाल आज की पोस्ट के नाम पर एक गीत संभालिये 

मौसम कितने रंग बदलता है...


पल-पल रंग बदलता मौसम
ऋतुओं को भी छलता मौसम
सावन की रिश्तेदारी में भीग-भीग कर जलता है
मौसम कितने रंग बदलता है...

कहीं-कहीं दिलवाला मौसम
और कहीं पर काला मौसम
आह्ट का बहकावा देकर धरती माँ को छलता है
मौसम कितने रंग बदलता है...

कहीं छावं सा प्यारा मौसम
कहीं धुप का मारा मौसम
प्रीत की गर्मी में तो तपता मगर विरह में गलता है
मौसम कितने रंग बदलता है...

किसी को अश्रुजल सा मौसम
किसी को गंगाजल सा मौसम
अपनी मनमानी के चर्चे करता और उछलता है
मौसम कितने रंग बदलता है...
--योगेन्द्र मौदगिल

भारती के चित्र पे लहू की धारियां...

इधर हरियाणा में विधानसभा भंग हो गई. एकाध दिन में चुनावों की तिथि भी घोषित हो जायेगी. चाहता था कुछ चुनावी छंद प्रस्तुत करूं.... लेकिन उनसे पूर्व आप सब के लिये एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूं.... शायद अच्छा लगे... प्रतिक्रिया अपेक्षित...



उपवन की जिनपे थी जिम्मेवारियां.
वही लिये फिरते हैं अब आरियां.
देश में बढ़ी यें कैसी दुश्वारियां----भारती के चित्र पे लहू की धारियां..

गिल्ली-डंडे वाले हाथ पीयें सिग्रेट.
गंगाजल की जगह हैं बीयर के क्रेट.
नारी का सम्मान अब बन गया रेट.
पश्चिम समान हुये हम भी अपटूडेट.
जानकी के देश बिकती हैं नारियां,
औरत के भाग्य लिखी सिसकारियां.
देश में बढ़ी यें कैसी दुश्वारियां----भारती के चित्र पे लहू की धारियां..

बैंक-बीमा इस्ट्राइक का करते हैं शोर.
ठगों की जमात का है शैयरों पै जोर.
एक जैसे लगते हैं पुलिस व चोर.
बहूरूपिये हैं सारे देखो जिस ऒर.
देश खाने की भी लगती हैं बारियां,
नाम लोकतंत्र काम है मक्कारियां.
देश में बढ़ी यें कैसी दुश्वारियां----भारती के चित्र पे लहू की धारियां..

माइक के माहिरों से कौन है बचा.
राम की कथा हो चाहे वेदों की ऋचा.
पेट भरने के लिये शोर है मचा.
राम-राम, कृष्ण-कृष्ण हो या चाचाचा.
धरम की धंदे से हैं भागीदारियां,
कीचड़ से भरी रहें पिचकारियां.
देश में बढ़ी यें कैसी दुश्वारियां----भारती के चित्र पे लहू की धारियां..

बच्चों में सरस भाव भरिये जनाब.
बहू-बेटियों का मान करिये जनाब.
टेलीविजन से पर डरिये जनाब.
घर को बाज़ार मत करिये जनाब.
आप ही के कांधों पे है जिम्मेवारियां,
आंगन में गूंजने दो किलकारियां.
देश में बढ़ी यें कैसी दुश्वारियां----भारती के चित्र पे लहू की धारियां..
देश में बढ़ी यें कैसी दुश्वारियां----भारती के चित्र पे लहू की धारियां..
--योगेन्द्र मौदगिल