आंगन सूना छोड़ गये......

शासक अपने-अपने ढंग से इतिहास को मोड़ गये.
हव्वा का हंटर से रिश्ता शुरूआत से जोड़ गये.

आवारा सपनों की खातिर आग लगा कर गली-गली,
घर के आंगन की आंखों में जलता जंगल छोड़ गये.

कैसे थे वो लोग न जाने बस्ती-बस्ती रहते थे,
बूढ़ी लाठी तोड़ गये जो बचपन को झिंझोड़ गये.

रौब, गालियां, बलात्कार, उत्पीड़न, आंसू, अंगारे,
औरत के हिस्से में वो कैसे नज़राने छोड़ गये.

रात हवा ने दस्तक दी तो बूढ़ा दरवाज़ा बोला,
जाने वाले चले गये पर आंगन सूना छोड़ गये.
--योगेन्द्र मौदगिल

24 comments:

रविकांत पाण्डेय said...

रात हवा ने दस्तक दी तो बूढ़ दरवाज़ा बोला
जाने वाले चले गये पर आंगन सूना छोड़ गये

बहुत सुंदर! हिंदी-दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

Udan Tashtari said...

बेहतरीन!!

हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ.

कृप्या अपने किसी मित्र या परिवार के सदस्य का एक नया हिन्दी चिट्ठा शुरू करवा कर इस दिवस विशेष पर हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार का संकल्प लिजिये.

जय हिन्दी!

संजय तिवारी ’संजू’ said...

आपका हिन्दी में लिखने का प्रयास आने वाली पीढ़ी के लिए अनुकरणीय उदाहरण है. आपके इस प्रयास के लिए आप साधुवाद के हकदार हैं.

आपको हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनायें.

Arvind Mishra said...

प्रभावित करती एक और रचना !

seema gupta said...

भावनात्मक प्रस्तुती....सुन्दर
regards

seema gupta said...

भावनात्मक प्रस्तुती....सुन्दर
regards

पी.सी.गोदियाल said...

रात हवा ने दस्तक दी तो बूढा दरवाजा बोला
जाने वाले चले गए आँगन सूना छोड़ गए

बहुत ही बढिया, मोदगिल जी !

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत बेहतरीन भाई. आजकल कित गायब हो लिये?

रामराम.

Nirmla Kapila said...

रात हवा ने दस्तक दी तो बूढ़ दरवाज़ा बोला
जाने वाले चले गये पर आंगन सूना छोड़ गय
बहुत खूब आखिरी तीनो शे र लाजवाब हैं बधाई

विनोद कुमार पांडेय said...

जब इंसान की फ़ितरत देखी,बरबस मुँह से निकल पड़ा,
जो दिल से दिल मिलते थे, अब वो सारे होड़ गये.


बढ़िया भाव..बढ़िया रचना...

RC said...

Maktaa pasand aaya.

Mithilesh dubey said...

लाजवाब , बहुत खुब। शानदार रचना।

नीरज गोस्वामी said...

भाई जी....जय हो...और क्या कहूँ...???
नीरज

दिगम्बर नासवा said...

कमाल guru dev ......... आपके अपने andaaz की tez dhaar ......... pranaam hamaara

ओम आर्य said...

बहुत बहुत ही सुन्दर रचना............गहरे उतार ले गयी बन्धू

अर्शिया said...

अत्यंत मार्मिक रचना।
{ Treasurer-S, T }

रंजना said...

बहुत ही सुन्दर.....हमेशा की तरह.

समयचक्र said...

पढ़कर आनंद आ गया बढ़िया रचना . धन्यवाद

समयचक्र said...

पढ़कर आनंद आ गया बढ़िया रचना . धन्यवाद

योगेश स्वप्न said...

bahut khoob. badhaai.

sandhyagupta said...

PAhli do panktiyon ne khas taur par kaphi prabhavit kiya.Yun hi likhte rahiye.

अंकित "सफ़र" said...

नमस्कार यौगेन्द्र जी,
समाज पे कटाक्ष करती हुई ग़ज़ल बहुत खूब कही है आपने.
ऐसी गज़लें बहुत कम देखने को मिलती हैं.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

जाने वाले चले गये पर आंगन सूना छोड़ गये
बहुत खूब!

गौतम राजरिशी said...

लाजवाब शेर सारे के सारे गुरूवर !