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पैसा सब कुछ पैसा क्या.........................

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एक और स्मृति-चित्र
जयपुर के महामूर्ख सम्मेलन का चित्र
मेरे दायीं और क्रमशः सुरेश नीरव (दिल्ली), सर्वेश अस्थाना (लखनऊ)




और एक ग़ज़ल भी



पैसा सब कुछ पैसा क्या ?
देख रहा हूं दुनिया क्या ?

दीवारों को फांद ले यार,
दीवारों से डरना क्या ?

स्वर्ग यहीं है, नर्क यहीं,
आना क्या भई जाना क्या ?

देख न पाया इन्सां को,
फिर दुनिया में देखा क्या ?

फूल दिये पत्थर लेकर,
इससे बढ़िया सौदा क्या.

कहीं गेरूआ, पीत कहीं,
परदे ऊपर परदा क्या ?

फिर अपनों को ढूंढ रहा,
फिर खाएगा धोखा क्या ?

कान्हा तो मृगतृष्णा है,
क्या राधा भई मीरा क्या !

चलो 'मौदगिल' और कहीं,
हर डेरे पर रुकना क्या !
--योगेन्द्र मौदगिल

लो वो इतने बड़े हो गये.........

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कुछ नयी-पुरानी यादें इन चित्रों के माध्यम से....................
प्रस्तुत चित्र में रायपुर ३६गढ़ के रेलवे-स्टेशन के पास के एक स्टूडियो में क्रमशः कवि दिनेश देहाती (तिरोड़ी) योगेंद्र मौदगिल (पानीपत) पुलिसिया कवि उमाशंकर मनमौजी (एस पी रायपुर) एवं बाबा कानपुरी (नोएडा)




इससे पूर्व की पोस्ट में जो चित्र था उसमें हास्य पितामह स्वर्गीय शैल चतुर्वेदी (मुम्बई) के साथ मैं याने योगेंद्र मौदगिल पीछे कवि मनजीत सिंह (नारनौल) भी नज़र आ रहे है



            बहरहाल, आप सब का वंदन-अभिनंदन. ब्लाग-जगत पर सुबीर जी  की कहानी महुआ घटवारिन वाकई ब्लाग-जगत की उपलब्धि है मेरा विशिष्ट आग्रह है कि आप इस कहानी को जरूर पढें.


            इन दिनों नया कुछ भी लिखा नहीं जा पा रहा. इस कुंद स्थिति से उबरने के प्रयास में अपने संकलन से एक और ग़ज़ल आप सब के लिये.........

            प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी..........




लो वो इतने बड़े हो गये.
सब के सर पर खड़े हो गये.

बाप अफसर है मां डाक्टर,
कुअंर जी नकचढ़े हो गये.

रात-दिन भूख का फलसफा,
बच्चे भी चिड़चिड़े हो गये.

पेट-पीठ एक हैं बोझ से,
पांव तो फावड़े हो गये.

ताक और झांक के शौक में,
चौक में सब खड़े हो गये.

मर गये लोग भूकंप से,
फिर नये आंकड़े हो गये.

मौज आई जो कुंभकार की,
सारे ढेले घड़े हो गये.
--योगेन्द्र मौदगिल

अपने ही मन के बीच....

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मन आजकल कुछ अजीब से संशयों में हिलोरें ले रहा है..... समझ नहीं पा रहा था कि आज क्या पोस्ट करूं..... बस फिर अपना संग्रह उठाया और आंख मूंद कर जो पेज खोला............ उस पर यही ग़ज़ल थी......... आप भी देख लीजिये........................




हो आग का अहसास जो अपने बदन के बीच.

कारण तलाश यार तू अपने ही मन के बीच.



औक़ात भूल जाते हैं आग़ोश में आकर,

दहके हुए अंगार भी गंगोजमन के बीच.



ये आंख जो भी देखती है भूलती नहीं,

टिकता नहीं है मन तभी तो आचमन के बीच.



लौ जानती है शेष है अहसास का भरम,

मेरी लगन के बीच या तेरी लगन के बीच.



परियों के देश जाऊंगा मैं एक दिन जरूर,

जंग छिड़ गयी है मौदगिल अब तो सपन के बीच.


--योगेन्द्र मौदगिल

यहां तो मूंग दलती हैं निगाहें................

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पुनः एक ग़ज़ल लेकर उपस्थित हूं.... पूर्ववत् दुलार अपेक्षित....

कभी बलियों उछलती हैं निगाहें.
कभी घंटों फिसलती हैं निगाहें.

मदरसा, दैर हो थाना या कोठा,
कईं कपड़े बदलती हैं निगाहें.

अजब उद्योगपतियों का शहर है,
यहां सिक्कों में ढलती हैं निगाहें.

चलो कुछ देर आंखें मूंद ले अब,
यहां मन को मसलती हैं निगाहें.

वहीं तक का सफ़र है ठीक बंधु,
जहां तक साथ चलती हैं निगाहें.

नज़ारे दूर खो जायें कहीं तो,
यक़ीनन् हाथ मलती हैं निगाहें.

हटो, दीवार के उस पार बैठें,
यहां तो मूंग दलती हैं निगाहें.

मोहल्ला ये शरीफों का है साहेब,
यहां गिर कर संभलती हैं निगाहें.
--योगेन्द्र मौदगिल

वक्त है कुछ सोच अंबर के लिये......

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आप सब के लिये एक ग़ज़ल लेकर हाज़िर हूं............

बारी-बारी लोग मरते ही रहे,
कोई मस्ज़िद कोई मंदर के लिये.

उम्र भर घर में रहा लेकिन मुझे,
स्वप्न आते ही रहे घर के लिये.

आबरू से बेशकीमत लाल को,
बेच डाला तूने कंकर के लिये.

ये है कलियुग काम पत्थर से चला,
ताकना मत बाट गौहर के लिये.

धीरे-धीरे फूंक डाला ज़िस्म को,
वासनाऒं के बवंडर के लिये.

आजमाये कौन मन की योजना,
लोग चिंतित तन के पिंजर के लिये.

आदमी के पाप ले बहती रही,
हर नदी सीधे समंदर के लिये.

भू को बंजर कर दिया पर 'मौदगिल'
वक्त है कुछ सोच अंबर के लिये.
--योगेन्द्र मौदगिल

अमेरिकन शनि की मंदी चाल......

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इधर क्या अखबार, क्या टीवी सारे के सारे दुनियाभर में अमेरिकन कृपा को आर्थिक मंदी कह-कह कर हाय-तौबा मचा रहे हैं. उधर अपने नेता घोटराम घोसी घरवाली को कह कर घर से निकले कि दो-चार एस्कोडा या स्कारपियो ही खरीद लाऊं. ऐसा मंदी का दौर फिर कहां मिलेगा..

सोने पर छूट, हीरों पर छूट, कारों पर छूट, टीवी पर छूट, कम्प्यूटर पर छूट, सीडीप्लेयर पर छूट ससुरा ऐसा छूट का सीजन आया कि बारबालाऒं ने भी देश में छायी आर्थिक मंदी से प्रभावित होकर छूट का कर दिया ऐलान..... तो बहुत सारे शिखंडी किस्म के पहलवान बोले कमाल है यार... हमें क्या पता था कि सेन्सेक्स का मार्केट डाउन हो तो सेक्स का मार्केट भी.....

खैर इधर घरवाली की हालत यह है कि मुझे अखबार पढ़ते देख ले तो घबरा जाती है. पिछली बार रिलायंस के आइपीऒ का बीपी उतर गया था और मेरा चढ़ गया था..

आजकल अखबारों के संवाददाता मूली, प्याज, बैंगन के भाव भी छापते रहते हैं. इससे खतरा बना रहता है.

इधर कल्लू पनवाड़ी, बिल्लू मोची, नंदी किरयानी, संजू ढाबेवाला और क्या गिरधारी, क्या बनवारी, सारे के सारे सेंसेक्स के खोमचे गिनते फिर रहे हैं,,,, और दलाल... दलाल चाहे प्रापर्टी के हों चाहे शेयरों के, दोनों मौसेरे भाई.... लगवा दिया सबका पैसा शेयरों में.. टीवी के एक ऐलान ने सारे के सारे सूली पर लटका दिये... मेरी समझ में नहीं आता कि ये समझदार जिन्हें स्टेट लेवल का धंदा नहीं आता ये दलाल के झांसे में इंटरनेशनल क्यों हो जाते हैं.....

समझदार लोग आजकल अखबारों का नाश्ता कर के दिन का मैन्यू सैट करते हैं. अपने मोहल्ले के शर्मा जी अखबार के चस्की..... मजे ले ले कर अखबार चाटा और सीधे पहुंचे बल्ली पकौड़े वाले के पास और पकौड़ों का भाव पूछा बल्ली बोला जी, नब्बे रूपये किलो तो शर्मा जी ने चीख मारी, अबे बल्ली, शरम नहीं आती इतने महंगे पकौड़े बेच रहा ...है अबे देश दुनिया की कोई खबर है के नहीं.... शेयर औंधे गिर गये.. क्रूड आयल तीस डालर गिर गया.. और तूने तीस पैसे भी कम नहीं किये.... बल्ली मूह बा कर बोला मेरे पकोड़ों का तो रेट तब गिरेगा जब लाला घी-बेसन के दाम कम करेगा..... अब भला क्या मनमोहन सिंह समझाएंगें इन शर्मा जी को कि भैय्या अब क्रूड आयल की जात-बिरादरी का भी नहीं पता तो क्यों बहसते घूम रहे हो....

अब इधर अपने एक मंत्री जी के सुपुत्र ने मंदी के दोर में जरमनी से आई एक पर्यटक सुकन्या से बलात्कार कर दिया. अब पुलिस पीछे-पीछे और वो फरार.. उधर मंत्री जी पीए से झगड़ रिये अबे पुलिस को समझाऒ कि इस मंदी के दोर में अपनी अक्ल का त्वरित प्रयोग कर रहा था और सेंसेक्स में से सें हटा कर शेष को उठाने का पुनीत कार्य कर रहा था..

दुनिया भर में आर्थिक मंदी का इतना शोर-शराबा... हाय राम.... मेरी तो समझ में कुछ नहीं आता बाज़ारों में डबल भीड़... बढ़ते शोरूम्स... खुलते माल्स... रातों-रात दसियों गुणा बढ़ती सेल.... पित्ज़ा-बर्गर, कार, कारपेट, कपड़े, रेडिमेड, फैशन, बुटीक, श्रंगार, सौंदर्य, प्रसाधन, काम, सेक्स, टाइल, मारबल, फर्नीचर की कहीं भी किसी भी दुकान शॅरूम पर चले जाऒ वहा भी बातें मंदी की मगर बड़-बड़े गांधीनोटों से लदे पर्स अठखेलियां करते हैं.....

मंदी की मार झेल रहा है मजदूर जिसे आटा दोगुने, सब्जी तिगुने और दाल चौगुने दाम पर मिलती है. मध्यम व्यवसाय... जिन्हें माल का अजगर निगल रहा है. हर रोज मरते, पिटते, कटते, खटते, दंडते फिर भी खीसें निपोरता मिडल क्लासी.... या तो भूखा या फिर खाता बासी.... फिर भी गाता भीम पलासी घूम रहा है.
निबटने के दौर में कुढ़ता, खांसता, गिरियाता, गलियाता, राजनीत के कीचड़ में खिसियाता, अखबार और टीवी के न्यूज चैनलों पर तांत्रिकों और बाबाऒं के टिप्स नोट करता, अमेरिकन शनि की मंदी चाल की काट खोज रहा है...
आइये हम भी उसकी सहायता करें.....
आमीन.......
--योगेन्द्र मौदगिल

सबरंग रेडियो डेनमार्क पर योगेन्द्र मौदगिल

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भाई अनुराग शर्मा जी ने बहुत पहले मुझे कहा था कि मैं अपनी कविताऒं की आडियो भी साथ ही लगाऊं मगर कंप्यूटर के आधे-अधूरे ग्यान के कारण अब तक नहीं कर पाया था पर इस बीच बेटे दिवाकर की सहायता से कविता रिकार्ड कर के भेजनी सीख गया. यद्यपि ब्लाग पर अभी भी पोस्ट नहीं कर पा रहा हूं.........
मगर इस बीच नीरज जी की प्रेरणा व मार्गदर्शन से सबरंग रेडियो डेनमार्क से कुछ रचनाएं प्रसारित हुई उन्हीं का लिंक प्रस्तुत है सुनियेगा



मन जैसा था वैसा है..

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इससे पूर्व की रचना पर प्राप्त आपकी टिप्पणियों के लिये आभार प्रगट कर आप सब के स्नेह को हल्काऊंगा नहीं लीजिये एक बार फिर आप सब के लिये एक और हल्की-फुल्की रचना


क्यों है, क्या है, कैसा है..?
लगता मेरे जैसा है..

भीतर चाहे जैसा है..
पर बाहर इक जैसा है..

मुद्दत बाद मिला है वो,
अब भी बिल्कुल वैसा है..

एक झलक में चढ़ बैठा,
हाय.. नशा ये, कैसा है..

झीना-झीना सा पर्दा,
तेरी पलकों जैसा है..

वो भी तुझको ढूंढे है,
जिसका सब-कुछ पैसा है..

तन तो ढलता रहा मगर,
मन जैसा था वैसा है..
--योगेन्द्र मौदगिल

आजकल फैसला नहीं होता.........

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आप सब के लिये



जब तलक सिर-फिरा नहीं होता
आजकल फैसला नहीं होता

बात सच्ची बताने को अक्सर
घर में भी होंसला नहीं होता

सपने साकार किस तरह होते
तू अगर सोचता नहीं होता

सच तो सच ही रहेगा ऐ यारों
झूठ में होंसला नहीं होता

लूट लेते हैं अपने-अपनों को
आज दुनिया में क्या नहीं होता

शुद्ध हों मन की भावनाएं अगर
कोई किस्सा बुरा नहीं होता
--योगेन्द्र मौदगिल

इस अंतराल की चौथी कविता.........

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बस बहुत हो गया मित्रों, इस चौथी कविता के साथ इस राजनैतिक एपिसोड का चौथा कर रहा हूं,,,, मैं जो पेल रहा हूं बस उसे और झेल लीजिये....


चुनावी घोषणाऒं के
बजट ने आज तक कुछ नहीं संवारा
जनता के लिये
बजट के बीच में से ज निकाल कर
बट से मारा
पर यार जनता भी कम नहीं
फट से उठी
चट से हो गयी खड़ी
ऒर नाड़ा कसते-कसते
बजट पर जा पड़ी
फिर तो ढीली हो गयी
वायदों की अंटी
पता नहीं कैसे पूरी होगी
रोज़गार गारंटी
रोज़गार याने काम
क्योंकि काम नहीं तो आराम नहीं
आराम नहीं तो काम नहीं
पर इस सबके बावजूद
कमाल के हैं ये राजनीतिक जोकर
वही पुरानी लोकलुभावन कहानी
फिर दोहरा गये
किसानों बुनकरों
महिलाऒं को उनकी औक़ात बता गये
राशन छोड़ो कम्प्यूटर लाऒ
फीमेल का काम ईमेल से चलाऒ
सस्ती नैनो लेकर चांद पर जाऒ
अपना हाथ जगन्नाथ बनाऒ
जब हो जाऒ जगन्नाथ
तो अपने आप को स्वयं संभालो
दिमागों में भ्रम मत पालो
इन सारी बातों ने देश चूल तक हिला दिया
दिन दहाड़े
खुली आंखो से सपना दिखा दिया
सपना
सुसरा सपना भी
ऐसा सपना
कि राम नाम जपना
पराया माल अपना
इसीलिये प्यारे
हम तो अब ईमान को रखते छत पर टांग
फैशन के इस दौर में गारंटी मत मांग
--योगेन्द्र मौदगिल

इस अंतराल की तीसरी कविता........

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राजनीति
थोथी राजनीति
थोथी राजनीति में कोई दम नहीं
यदि मान लो
किसी तरह दम हो जाये
तो ये इधर-उधर फैली खरपतवार
उसे भी खा जाये
खरपतवार का भी काम
है बड़ा गदर
ना इसकी कदर
ना उसकी कदर
चूस कर फेंक दे
नगर हो या डगर
राजनीति के शेर
गुफा में दहाडें बाहर ढेर
लेकिन भाई साहब
आप स्वयं ढूंढना फर्क
उसी गोरखधंदे का अर्क
जब कोई राजनेता
अपने चेहरे पर मलता है
तो यही गुड़गोबर जबरदस्त फलता है
इसी के सहारे
छवियां बिगडुती है बनती हैं
किसी की तनती है
किसी की छनती है
कोई सोता है
कोई रोता है
कोई पाता है
कोई खोता है
समझदार राजनीतिग्य
अपने चेहरे की कालिख
विपक्षी के साबुन से धोता है
क्योंकि जनता का तो
हर युग में यही हाल रहा है
इसीलिये अपन ने कहा है
कि
पहले आंखें मूंद कर खूब बढ़ाया रोग
आग लगी तो फिर कुआं चले खोदने लोग
--योगेन्द्र मौदगिल

इस अंतराल की दूसरी कविता.............

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पैंतरेबाजियां
ड्रामेबाजियां
लफ्फाजियां और चालबाजियां
हर दल का दिनमान है
सारे दलों का
अपना-अपना योगदान है
और दलों की इसी दलदल में
अपना हिंदुस्तान है
बगल में छुरी
मूंह में राम
हाथ में रम
मन में काम
अनाचार है ललित-ललाम
राधा के घर राम
सीता के घर श्याम
हे मेरे राम
ना राजपथ
ना राजपंथी
ना जनपथ
ना आमपंथी
सारे नंगे
क्या राजवादी
क्या दामपंथी
झूठे वायदे, भ्रष्टाचार
चोरी, डकैती, बलात्कार
अपहरण उद्योग गजब का धांसू
राजनीति के देवता
बहा रहे घड़ियाली आंसू
मगरमच्छों के भाव आसमान पर
तिरंगा अवसान पर
समझ में नहीं आता
हिंदुस्तान राजनेताऒं पर
या
राजनेता हिंदुस्तान पर
--योगेन्द्र मौदगिल