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शब्दों से सहवास मियां ........

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उन सब ने खंडित कर डाला जिन पर था विश्वास मियां
क्या अपनों को धर के चाटे क्या अपनों की आस मियां


इस बस्ती से आते-जाते नाक पे कपड़ा रख लेना
बड़ी घिनौनी लगती है अब आदम की बू-बास मियां


रोज-रोज का खून-खराबा रोज-रोज की दहशत से
दिन पर दिन घटता जाता है जीवन का उल्लास मियां


कैकेयी की माया से दशरथ अगर कहीं बच जाता तो
मुमकिन था के टल ही जाता राम को तब बनवास मियां


किसी काम में कोई अड़चन भूले से भी नहीं हुई
जब से अफसर को डाली है हरे नोट की घास मियां


लाज़िम नहीं है तेरे-मेरे कहने से ही काम बने
अंधों की दुनिया में काने ही होते हैं खास मियां


कहने हैं तो कहो 'मौदगिल' नये-नये अशआर सदा
वरना छोड़ो क्यों करते हो शब्दों से सहवास मियां


- योगेन्द्र मौदगिल





उर्वशी के नाम पर......

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कैद बख्शी है हमें यों ज़िन्दगी के नाम पर
ज्यों अंधेरे का कत़ल हो रौशनी के नाम पर


और क्या करते भला हम आदमी के नाम पर
छल-कपट करते रहे हैं बन्दगी के नाम पर


भूख की सौगात बच्चों को मिलेगी भेंट में
युद्धरत संसार से नूतन सदी के नाम पर


बुतपरस्ती का जुनूं बढ़ता रहा तो एक दिन
घर जलेंगें मुफलिसों के आरती के नाम पर


स्पर्श कुण्ठित भावना गूंगी बधिर संवेदना
नीर नयनों में नहीं निश्छल हंसी के नाम पर


इन्द्र की आदत तपस्या भंग करने की रही
मेनका रंभा शची या उर्वशी के नाम पर
- योगेन्द्र मौदगिल



खुद को खुद से छलता पानी.....

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जब भी रंग बदलता पानी.
खुद को खुद से छलता पानी.


पृथ्वी का अनमोल खज़ाना,
उगती फसलें-चलता पानी.


कहीं त्रासदी-कहीं ज़िन्दगी,
मीलों-मील उछलता पानी.


दुनिया भर ऐसे पसमंज़र,
भूखे पेट-उबलता पानी.


उस की मर्जी दे या ना दे,
आंखें और छलकता पानी.
- योगेन्द्र मौदगिल



आंखों में.....

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सपनों का अहसास, जरूरी आंखों में.
लम्हा-लम्हा प्यास, जरूरी आंखों में.


कस्में-वादे, हया-वफ़ा, रिश्ते-नाते,
कदम-कदम विश्वास, जरूरी आंखों में.


आएगा, लौटेगा, इक दिन परदेसी,
टिकी रहे ये आस, जरूरी आंखों में.


निंदक में, आलोचक में है फर्क बड़ा,
हरपल ये आभास, जरूरी आंखों में.


आंख खोल कर भी जो देख नहीं पाते,
उनके लिये उजास, जरूरी आंखों में.


मिशन हो के एंबीशन, लाइफ में बंधु,
सपने भी हों खास, जरूरी आंखों में.


पहली नज़र में पेंच अगर लड़ ही जाएं,
फिर तो बाईपास जरूरी आंखों में.


एक नज़्र का खेल 'मौदगिल' खेलो तो,
दृष्टिभेद विन्यास ,जरूरी आंखों में.
-योगेन्द्र मौदगिल

घर से घर के बीचोंबीच.....

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इक धमाका सा हुआ जब से नगर के बीचोंबीच.
कितनी दीवारें उठी फिर घर से घर के बीचोंबीच.


इन दिवारों से कहो अब कानाफूसी बंद हो,
हर कदम पर कान हैं अब इस शहर के बीचोंबीच.


स्कूली बच्चे ढूंढते रिक्शा में बैठे गौर से,
अपना भविष्य फिल्म के हर पोस्टर के बीचोंबीच.


पेट की मजबूरियां क्या-क्या कराती हैं सखी,
सोचती अक्सर वो नीले नाचघर के बीचोंबीच.


अब तो बस आतंक के डंके बजे हैं देख लो,
मौत के अल्फाज यारों हर खबर के बीचोंबीच.


कितनी नावें गर्व से उल्टी पड़ी हैं 'मौदगिल',
कितने तिनके शान से फैले नहर के बीचोंबीच.


- योगेन्द्र मौदगिल



हर हाकिम, शैतान हो गया...

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उन्नत कृषि विग्यान हो गया.
भोंदू, वृद्ध किसान हो गया.


लोकतंत्र के नरकतंत्र में,
हर हाकिम, शैतान हो गया.


भूख उगा करती खेतों में,
रहन, फ़सल-खलिहान हो गया.


ऊंची हर दूकान हो गयी,
फीका हर पकवान हो गया.


आपस में लड़-लड़ कर घायल,
अपना हिन्दुस्तान हो गया.


राम-राज है, जब से डाकू,
थाने में दीवान हो गया.


काले धन के धर्म-कर्म में,
घूस खिलाना दान हो गया.


'नहीं चाहिये मुझको पोती'
दादी का फ़रमान हो गया.


बापू का बंदर पढ़-लिख कर,
लम्पट-बेईमान हो गया.
--योगेन्द्र मौदगिल



मुल्ला देख या.....

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मुल्ला देख या पण्डे देख.

लिये धरम के डण्डे देख.



आहट हुई इलैक्शन की,

बस्ती-बस्ती झण्डे देख.



राजनीत का प्रेत चढ़ा,

खादी वाले गण्डे देख.



कहे भारती रो-रो कर,

पूत हुए मुश्टण्डे देख.



जंगल का कानून समझ,

या शहरी हथकण्डे देख.



सफल कैबरे, हूट कवि,

सड़े टमाटर-अण्डे देख.

--योगेन्द्र मौदगिल


ऐसा भी क्या....

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कंकरीट के चौबारे में, अद्भुत है नक्कासी.

रौशनदान में अटकी चिड़िया, मर गई भूखी प्यासी..



इतनी सुविधा के हित खरचा-चर्चा चौबीस घंटे.

दिन में गाहक, रात फैक्टरी, भैय्या के सब टंटे..



बाबा भेज दिये भैय्या ने उल्टे पैरौं गांव,

मैली छत की हंसी उड़ाती, बरसाती की छांव..



चौबारे पर बैठी भाभी चौराहे को ताके,

मूस-बिलौटे घर में खेलें कुत्ते भीतर झांके..



घर का पाहुन दरवाज़े की घंटी नहीं बजावै.

देख के महरी दांत भीच कै मंद मंद मुस्कावै..



बच्चे गये बोर्डिंग घर में सहज सखि-सम्मेलन.

ताश-तंबोला धुर सारा दिन, जुल्मी किट्टी फैशन..



देवर दुश्मन लगे रे भैय्या, ननदी लगे चुड़ैल.

मन के भीतर-घर के भीतर, भरा उफनता मैल..



ऐसा भी क्या घर होता है होश संभाली सोचा ?

घर को घर कहने से पहले मन सारा दिन लोचा..

 
--योगेन्द्र मौदगिल




गेरुआ : चार व्यंग्यचित्र

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गेरुआ : चार व्यंग्यचित्र घनाक्षरी में

आज चौथा




रासलीला प्रिय मुझे, जीवन भी रास लगे,
इसीलिये क्षण-क्षण, रास रचा लेता हूं.


रुक्मिणी अपनी को, रखता हूं घर में ही,
बाहर तो बाहर की, राधा नचा लेता हूं.


चाहे गिरे बिजली, पहाड़ टूट जाये पर,
फिर भी मैं खुद को, हुजूर बचा लेता हूं.


दौर डाइटिंग का हो, अपनी रसोई में तो,
पड़ौसियों के घर की मैं, खीर पचा लेता हूं.
--योगेन्द्र मौदगिल



गेरुआ: चार व्यंग्यचित्र

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गेरुआ: चार व्यंग्यचित्र-------घनाक्षरी में.....

आज तीसरा




नौकरी में भूखा रहा, बिजनेस में नंगा रहा,
अक्समात् बुद्धि आई, धार लिया गेरुआ.


फिर तो ये जीवन का, दर्शन समझ लिया,
विचार-व्यवहार में, उतार लिया गेरुआ.


मेरी कामनाएं भला, मारता वो कैसे कहो,
मेरी कामनाऒं ने ही, मार लिया गेरुआ.


गेरुए से धन आया, धन से विलास आया,
और यों विलास से ही, हार लिया गेरुआ.
--योगेन्द्र मौदगिल



गेरुआ : चार व्यंग्यचित्र

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गेरुआ : चार व्यंग्यचित्र------घनाक्षरी में.......

आज दूसरा




सुबह राम बेचता हूं, सांझ श्याम बेचता हूं,
फूल, परशाद, खील, नारियल-मौली जी.


राम जी की किरपा से. काया फल-फूल रही,
भगतों को देता, राम-नाम की मैं गोली जी.


सफेद संगेमरमर, दे गये हैं काले भक्त,
उसको निहार मैं तो, भूल गया खोली जी.


कृष्णमय हो गया है, अंग-प्रत्यंग मेरा,
भगतनियों से, कर लेता हूं ठिठोली जी.
--योगेन्द्र मौदगिल

गेरुआ चार व्यंग्यचित्र

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गेरुआ : चार व्यंग्यचित्र------घनाक्षरी में

आज पहला...




घर में तो एक बीवी, काटती हरेक बात,
यहां तो निहाल हूं जी, चेलियों की फौज से.

हो गया था तंग, बदरंग हो गया था मैं,
घर में गृहस्थी के, क्लेश रोज-रोज से.

गेरुआ बदनधार, मन्दिर पै कब्जा कर,
तुम भी उठा लो लाभ, मेरी इस खोज से.

काहे मन मारते हो, खीजते हो, जलते हो,
देख मेरा खान-पान, रंग-ढंग, मौज से
--योगेन्द्र मौदगिल