उन सब ने खंडित कर डाला जिन पर था विश्वास मियां
क्या अपनों को धर के चाटे क्या अपनों की आस मियां
इस बस्ती से आते-जाते नाक पे कपड़ा रख लेना
बड़ी घिनौनी लगती है अब आदम की बू-बास मियां
रोज-रोज का खून-खराबा रोज-रोज की दहशत से
दिन पर दिन घटता जाता है जीवन का उल्लास मियां
कैकेयी की माया से दशरथ अगर कहीं बच जाता तो
मुमकिन था के टल ही जाता राम को तब बनवास मियां
किसी काम में कोई अड़चन भूले से भी नहीं हुई
जब से अफसर को डाली है हरे नोट की घास मियां
लाज़िम नहीं है तेरे-मेरे कहने से ही काम बने
अंधों की दुनिया में काने ही होते हैं खास मियां
कहने हैं तो कहो 'मौदगिल' नये-नये अशआर सदा
वरना छोड़ो क्यों करते हो शब्दों से सहवास मियां
- योगेन्द्र मौदगिल







