कुछ नहीं बस.....

कुछ नहीं बस आदतन लाचार हैं.
तेरे दीवाने बड़े हुशियार हैं.

धीरे-धीरे गरदनों को नाप कर,
आरियों के साथ वो तैयार हैं.

वक्त जाने और क्या दिखलाएगा,
डाकुऒं के साथ पहरेदार हैं.

काट डाले पेड़ नदियां रोक दीं,
और कहते है कि हम बीमार हैं.

बात जो सच्ची है उसको गाऊंगा,
जानता हूं सब लिये तलवार हैं.

देख लेना एक दिन झुक जाएंगें,
पेड़ जितने भी यहां फलदार हैं.

बज गया डंका इलैक्शन का मियां,
शहर के बेकार भी बा-कार हैं.

जिन्दगी की तो चढ़ा देते बलि,
पत्थरों के लोग ताबेदार हैं.

हैं बुजुर्गों के लबों पर गालियां,
और बच्चे भी लिये हथियार हैं.

'मौदगिल' बाजार उनके बस में है,
वो कि जिनके हाथ में दीनार हैं.
--योगेन्द्र मौदगिल

25 comments:

Pratap said...

बहुत सुन्दर ग़ज़ल!!!
सदा ही बहुत धारदार होते हैं आपके शब्द.

Manish Kumar said...

बहुत खूब , मज़ा आ गया पढ़कर !

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

वक्त जाने ओर क्या दिखलाएगा
डाकुओं के साथ पहरेदार हैं

कितना स्टीक लिखा है आपने....बहुत ही उम्दा...

pawanchandan said...

क्‍या कहूं ऐ दोस्‍त मेरे मोद में
टिप्‍पणी को कलम तैयार है

दिगम्बर नासवा said...

कवीवर
इतना पैना लिखते हो, सीधा दिल में उतर जाता है.........घाव नज़र ही नहीं आता.
आपका अंदाज़ ऐसा है की अगर किसी और ब्लॉग पर भी बिना नाम के कोई रचना पढूंगा तो समझ जाउंगा अगर आप की होगी
प्रणा

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर लिखा है ...

मीत said...

वाह साहब ! क्या बात है.

शेर को अब शेर कहना छोड़ दे
बरछा, भाला, तीर हैं, तलवार हैं

P.N. Subramanian said...

" बाजार उनके बस में है,
वो कि जिनके हाथ में दीनार हैं."
बहुत खूब रही. आभार.

SWAPN said...

kaat daale ped...........

zindgi ki to...........

wah maudgil hamesh ki tarah ek aur behtareen, rachna.wah wah wah. badhaai.

"अर्श" said...

ऐसी रचना आई है गर ब्लॉग पे
जान लो मौदगिल बरखुरदार हैं...

वाह जी वाह क्या कहने आपने ..सीधा तमाचा मारा फिर से कसके आपने .... ढेरो बधाई साहब ...

अर्श

राजीव तनेजा said...

मिनटों में वार करते बेशुमार हैँ

मान गए उस्ताद जी आपको

लेखनी आपकी बड़ी धारदार है

राज भाटिय़ा said...

सच मै कलम तलबार से ज्यादा तेज है, बहुत ही सुंदर लिखा आप ने.
धन्यवाद

Anil Pusadkar said...

मुझसे पहले आये भाईयो ने इतनी तारीफ़ कर दी कि मेरे लिये तारीफ़ करने के कुछ नही छोडा।शानदार,धारदार,सदाबहार और पढने को मन चाहे बारबार्।

COMMON MAN said...

हमेशा की तरह धारदार, शानदार

नीरज गोस्वामी said...

बज गया डंका इलेक्शन का मियां
अब यहाँ बेकार भी बा कार है.

भाई जी कमाल कर दिया आपने...भाई थारा कोई जवाब ही नहीं....एक दम दो टूक बात कही है...कितनी क तारीफ करूँ कम ही पढ़ती दीख रही है...

नीरज

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत बढ़िया लगी हमेशा की तरह ..लफ्जों से बात कहती हुई शानदार

makrand said...

घणी कलेजा चिरण आली रचना सै भई. घणि बधाइ.

रामराम.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सुंदर और लाजवाब रचना.

रामराम.

seema gupta said...

बहुत सुन्दर ग़ज़ल

Regards

शोभा said...

हैं बुजुर्गों के लबों पर गालियां,
और बच्चे भी लिये हथियार हैं.
bahut khub.

RC said...

Nice .. but 'mar gayi machhli' zyada dumdaar hai! Uska Matlaa bahut achcha hai.

(Ye kya mouse-pointer lagaya hai Yogendra ji!!!)

RC

Shastri said...

बहुत ही चुने एवं सधे हुए शब्दों में आप ने जीवन के यथार्थ का वर्णन इस रीति से किया है कि कोई भी इसका आस्वादन कर सकता है.

सशक्त !!

सस्नेह -- शास्त्री

-- हर वैचारिक क्राति की नीव है लेखन, विचारों का आदानप्रदान, एवं सोचने के लिये प्रोत्साहन. हिन्दीजगत में एक सकारात्मक वैचारिक क्राति की जरूरत है.

महज 10 साल में हिन्दी चिट्ठे यह कार्य कर सकते हैं. अत: नियमित रूप से लिखते रहें, एवं टिपिया कर साथियों को प्रोत्साहित करते रहें. (सारथी: http://www.Sarathi.info)

डॉ .अनुराग said...

जिनके हाथ में दीनार है.....सही कहा साहब .आपने....छोटी बहर के आप मालिक है

pallavi trivedi said...

aapka apna style hai aur kya zordar style hai....bahut shaandar

विनीता यशस्वी said...

Shaher ka becar bhi ab ba-car hai...

bahut sahi likha hai apne...