गज़ल

घर में चिन्ता खड़ी हो गयीं.
बच्चियां अब बड़ी हो गयीं.

फूल हैरान हैं आजकल,
तितलियां सरचढ़ी हो गयीं.

इंद्र जैसी हुई कामना,
इंद्रियां उर्वशी हो गयीं.

बात-बातों में ढहने लगी,
बस्तियां भुरभुरी हो गयीं.

सुखनवर हो गया लो शह्र,
फिर नशिस्तें खरी हो गयीं.

पत्ते झड़ने लगे शाख से ,
वेदनाएं हरी हो गयीं.

पेट भरता नहीं 'मौदगिल',
बाजुएं अधमरी हो गयीं.
--योगेन्द्र मौदगिल

8 comments:

नीरज गोस्वामी said...

फूल हैरान हैं आजकल,
तितलियां सरचढ़ी हो गयीं.
इंद्र जैसी हुई कामना,
इंद्रियां उर्वशी हो गयीं.
पत्ते झड़ने लगे शाख से ,
वेदनाएं हरी हो गयीं.
भाईजी, एक से बढ़कर एक लाजवाब शेर दिए हैं आपने इस छोटी बहर की ग़ज़ल में..आप के फन के कायल हो गए हम तो....नयी नयी उपमाएं और सन्दर्भ आपकी ग़ज़लों को बार बार पढने को प्रेरित करते हैं...वाह जी वाह.
नीरज
पुनश्च:
आया तूफ़ान मंहंगाई का,
सारी खुशियां हवा हो गयीं.
देख टीवी को अम्मां कहे,
लड़कियां क्या से क्या हो गयीं.
इन दोनों शेरों में काफिया कुछ अलग लग रहा है...देख लें.
नीरज

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया गजल है।

पत्ते झड़ने लगे शाख से ,
वेदनाएं हरी हो गयीं.

seema gupta said...

देख टीवी को अम्मां कहे,
लड़कियां क्या से क्या हो गयीं.

"rightly said, beautiful"

महेंद्र मिश्रा said...

bahut sundar bahut pyari gajal .

Udan Tashtari said...

बात-बातों में ढहने लगी,
बस्तियां भुरभुरी हो गयीं.

--bahut khoob!!

योगेन्द्र मौदगिल said...

Sammer g, Mahendra g, Seema g aap sabhi ki tippani pakar mahaprassann hoon. Paramjeet g, sambhav ho to GURU GOVIND SINGH JEE ke kuchh drishtant uplabh karwaiega. Neeraj ji aapke liye 1 gazal or. is radeef v is bahar me lagbhag 40 sher diary me note hain. achraj to ye ki pustak me bhi ye gazal yon hi chali gai. Blog par to edit kar di par vahaan kya karoonga ? chalo mujhe yakeen hai ki mere paathak v jaankaar meri kshamta se parichit hain. Fir bhi aapne dhyan se gazal padi is sadashayta ke liye abhibhoot hoon.

Advocate Rashmi saurana said...

yogendra ji kya baat hai.

vipinkizindagi said...

sir,
एक से बढ़कर एक लाजवाब शेर