हैं साधुऒं के भेष में शैतान आजकल.
गायब हुए जहान से इन्सान आजकल
हर चेहरे प नक़ाब के ऊपर नक़ाब है,
मुश्किल बहुत हर शख्स की पहचान आजकल.
जो भेद खुल गया तो शर्मसार हो गया.
हर आदमी धंदे का तलबग़ार हो गया.
कोई राम बेचता है, कोई नाम बेचता,
संतों के लिये धर्म कारोबार हो गया.
इस रंगबाज दुनिया में रंगों की मौज है.
सब जानते हैं, आजकल नंगों की मौज है.
जीते हैं शराफत से कहाते हैं बेवकूफ,
लुच्चों की खूब मौज, लफंगों की मौज है.
लो सभ्यता का दिनबदिन उत्कर्ष देख लो.
अरे, सास-बहू-टीवी में संघर्ष देख लो.
ना पद्मिनी, ना पन्ना और न लक्ष्मीबाई,
हैं मल्लिका व राखियां आदर्श देख लो.
जीने का सिर्फ नाम सा करता हूं आजकल.
सच कहूं तो किश्तों में मरता हूं आजकल.
बूढ़ों की हत्या, बच्चों से होता बलात्कार,
अखब़ार को पढ़ने से भी डरता हूं आजकल.
बेखुदी में कैसा दम भरने लगा है मन.
संदेह अपने आप पर करने लगा है मन.
लम्पट गुरूघंटाल, छोटी छोटी बच्चियां,
अब पाठशालाऒं से भी डरने लगा है मन.
--योगेन्द्र मौदगिल