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सरदारनी का दूध शर्मसार ना करो..........

दो मुक्तक और फ़क़त आज के लिए.........

दे भ्रष्टता को दंड ऐसी लोकशाही दे..
अन्ना को सारे देश की तू वाहवाही दे..
इन हीजडों का वोट से संहार करेंगे,
ये आज के दिनमान को दिल्ली गवाही दे...

लोकतंत्र पे अरे तुम वार ना करो..
अमृत जो चखा है उसे बेकार ना करो..
सत्ता तो चार दिन की मौज, इस के लिए तुम,
सरदारनी का दूध शर्मसार ना करो..
---योगेन्द्र मौदगिल

आज १७ अगस्त २०११ के हालात के नाम .................................

दो मुक्तक.....
आज १७ अगस्त २०११ के हालात के नाम 

मूर्खता का तूने तो चट्टा लगा दिया.
राष्ट्रवादी दूध में खट्टा लगा दिया.
ना तो कहीं से सिंह व मोहन भी नहीं तू,
तूने तो सारे देश को बट्टा लगा दिया..


भ्रष्टाचारियों का नरक-द्वार है तिहाड़.
अन्ना को दी पनाह, नमस्कार है तिहाड़..
अनशन के लिए जिनको तेरी गोद मिल गयी,
उन के लिए तो काशी-हरिद्वार है तिहाड़..
--योगेन्द्र मौदगिल

छह मुक्तक

हैं साधुऒं के भेष में शैतान आजकल.
गायब हुए जहान से इन्सान आजकल
हर चेहरे प नक़ाब के ऊपर नक़ाब है,
मुश्किल बहुत हर शख्स की पहचान आजकल.

जो भेद खुल गया तो शर्मसार हो गया.
हर आदमी धंदे का तलबग़ार हो गया.
कोई राम बेचता है, कोई नाम बेचता,
संतों के लिये धर्म कारोबार हो गया.

इस रंगबाज दुनिया में रंगों की मौज है.
सब जानते हैं, आजकल नंगों की मौज है.
जीते हैं शराफत से कहाते हैं बेवकूफ,
लुच्चों की खूब मौज, लफंगों की मौज है.

लो सभ्यता का दिनबदिन उत्कर्ष देख लो.
अरे, सास-बहू-टीवी में संघर्ष देख लो.
ना पद्मिनी, ना पन्ना और न लक्ष्मीबाई,
हैं मल्लिका व राखियां आदर्श देख लो.

जीने का सिर्फ नाम सा करता हूं आजकल.
सच कहूं तो किश्तों में मरता हूं आजकल.
बूढ़ों की हत्या, बच्चों से होता बलात्कार,
अखब़ार को पढ़ने से भी डरता हूं आजकल.

बेखुदी में कैसा दम भरने लगा है मन.
संदेह अपने आप पर करने लगा है मन.
लम्पट गुरूघंटाल, छोटी छोटी बच्चियां,
अब पाठशालाऒं से भी डरने लगा है मन.
--योगेन्द्र मौदगिल