छत्तीसगढ़-२



पवन चन्दन जी ने सही फ़रमाया कि बात पानीपत से ही प्रारंभ होती तो बढ़िया रहता सो हे पाठकों मैं इस विवरण को पानीपत से ही शुरू करता हूँ. मेरी व्यस्तताओं के चलते बेटे दिवाकर ने मेरा रेसेर्वेतिओं कराया था और उसने टिकेट भी अपने पास रख ली. २५ कि रात उसने टिकेट मेरे बैग में राखी और बताया कि पापा सुबह ८ बजे कि ट्रेन है ग्त्ज्र निजाम्मुद्दीन से पर अपन अपने मूड में थे सो कहीं ६ सुन लिया और सुबह ४ बजे घर से चल कर हज़रात निजामुद्दीन पहुँच गए. वहां जाकर टिकेट को ध्यान से देखा तो पाया कि समय तो ८-४० का है तब समझ में आया कि पत्नी क्यों कह रही थी कि इतनी जल्दी जाकर स्टेशन पर बेंच सेवा करनी है क्या ?
खैर तभी ध्यान आया कि हज़रात निजामुद्दीन स्टेशन पर तो पवन चन्दन मिल सकते हैं फ़ोन लगाते ही तसल्ली हो कि जनाब ड्यूटी पर हैं और अपने ऑफिस में विराजमान. वो भी खुश और हम भी खुश. तुरंत उनके सिग्नल सेक  में  पवन चन्दन जितने बढ़िया कवि हैं उससे ज्यादा बढ़िया जिंदादिल  इंसान भी मगर गलत जगह फसे हैं उनकी ड्यूटी बहुत सख्त. कमबख्त एक संवाद मुझसे ४ अपने मातहतों से. बहरहाल मुझे तो वक़्त काटना था. सो अखबार. चाय और उनके चपरासी बांके की बातों के सहारे काट लिया और पवन जी तो फोन पर लगे रहे बांके मिंया टाइम  होते  ही गाड़ी में बैठा आये.
चलिए अब वहीँ से------------
पाबला जी की कृपा से गिलास मिल ही गए थे. मूव टू अभनपुर.. मैंने व्हिस्की और ललित भाई और अवधिया जी जो पहले से ही टल्ली थे उन्होंने ताल से ताल मिला होरी गाणी शुरू कर दी. और भाई पुरे रस्ते क्या गीत गाये....क्या गीत  गाये फुल मस्ती सिर्फ मस्ती और बस मस्ती ही मस्ती राजकुमार सोनी मज़े तो पूरे ले रहे थे पर सूफी थे न इसीलिए प्यार से देख सुन रहे थे मेरा गिलास खाली नहीं होने दिया.  खैर साहब ललित जी मस्ती, अवधिया जी की भावुकता और सोनी जी के प्रेम से सराबोर मैं उस समय न धरती पे था न गाडी में था न आसमान पर ससुरा पता ही नहीं की कहाँ था
अभनपुर आ गया. मैं और ललित जी उतर लिए सोनी जी और अवधिया जी रायपुर चल दिए
उसके बाद शुरू हुआ ललित भाई के डेस्कटॉप पर चैटिंग  का दौर कुछ और बातें और फिर २ बजे बिस्तर ले लिया. ६ बजे तक मच्छरों से प्यार, दुलार, मनुहार, फटकार, विचार, सत्कार, मैं तुझे मारूं तू मुझे मार चलता रहा.
 सुबह की शुरुआत चाय से हुई. इस बीच रात को फोन पर पंडित वत्स जी  और राजीव तनेजा जी से भी बात हो ली थी. सुबह गिरीश पंकज जी और राजकुमार ग्वालिनी  से फोन पर बढ़िया बातचीत जमी और तभी ललित जी ने सूचना दी की अनिल पुसदकर जी को भी आप पता चल गया और आज रायपुर प्रेस क्लब में होली का कार्यक्रम है वहां आपको भी जाना है. अपनी वापसी तो शाम ५ बजे की थी सो अपन फ्री थे.
लगभग 12.30 पर बस पकड़ कर मैं  रायपुर पहुँच गया. राजकुमार ग्वालानी जी ने मुझे पिक अप किया और पहुंचा दिया प्रेस क्लब. वहां बढ़िया महफ़िल जमी थी. भंग भवानी के गिलास सर्व  हो रहे थे. अनिल पुसदकर जी ने बड़ी गरमजोशी के साथ गले लगाया और फिर मंच पर चढ़ा दिया. -------क्रमश:--------


 

12 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

आपकी यात्रा का विशद वर्णन पूरा पढ़कर ही पूरा आनन्द आयेगा.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह जीवंत विवरण.

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर विवरण ओर चित्र भी बहुत सुंदर.

"अर्श" said...

kya baat hai byangsamraat ji bahut khub...rahi yatra...


arsh

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत रोचक यात्रा वृतांत.

रामराम.

अविनाश वाचस्पति said...

कवि ने लिखने शुरू किए संस्‍मरण
यह कविता से भी अच्‍छा विवरण
चित्र और भी लगाते
तो मजे खूब आते।

जी.के. अवधिया said...

योगेन्द्र जी! यह तो हमारा सौभाग्य है कि हमें आपका सानिध्य मिला! आशा करते हैं कि पुनः आपसे मिलना होगा।

Udan Tashtari said...

ये तो बड़ा शानदार विवरण चल रहा है...इन्तजार है आगे.

डॉ टी एस दराल said...

वाह , बड़ी सुरामयी यात्रा रही ।
दिलचस्प।

Anil Pusadkar said...

योगेन्द्र जी जितना मज़ा मिलकर आया था उससे डबल पढ कर आ रहा है।आप आते रहे छत्तीसगढ हम हमेशा स्वागत मे पलके बिछायें मिलेंगें।

डॉ. मनोज मिश्र said...

रोचक विवरण.

नीरज गोस्वामी said...

अवधिया जी पहले से टल्ली...ललित भाई पहले से टल्ली और बाकी बचे आप वो भी हो गए टल्ली...हाय रे हाय हम ना हुए आपके साथ...रोचक संस्मरण...
नीरज