लो वो इतने बड़े हो गये.........




कुछ नयी-पुरानी यादें इन चित्रों के माध्यम से....................
प्रस्तुत चित्र में रायपुर ३६गढ़ के रेलवे-स्टेशन के पास के एक स्टूडियो में क्रमशः कवि दिनेश देहाती (तिरोड़ी) योगेंद्र मौदगिल (पानीपत) पुलिसिया कवि उमाशंकर मनमौजी (एस पी रायपुर) एवं बाबा कानपुरी (नोएडा)




इससे पूर्व की पोस्ट में जो चित्र था उसमें हास्य पितामह स्वर्गीय शैल चतुर्वेदी (मुम्बई) के साथ मैं याने योगेंद्र मौदगिल पीछे कवि मनजीत सिंह (नारनौल) भी नज़र आ रहे है



            बहरहाल, आप सब का वंदन-अभिनंदन. ब्लाग-जगत पर सुबीर जी  की कहानी महुआ घटवारिन वाकई ब्लाग-जगत की उपलब्धि है मेरा विशिष्ट आग्रह है कि आप इस कहानी को जरूर पढें.


            इन दिनों नया कुछ भी लिखा नहीं जा पा रहा. इस कुंद स्थिति से उबरने के प्रयास में अपने संकलन से एक और ग़ज़ल आप सब के लिये.........

            प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी..........




लो वो इतने बड़े हो गये.
सब के सर पर खड़े हो गये.

बाप अफसर है मां डाक्टर,
कुअंर जी नकचढ़े हो गये.

रात-दिन भूख का फलसफा,
बच्चे भी चिड़चिड़े हो गये.

पेट-पीठ एक हैं बोझ से,
पांव तो फावड़े हो गये.

ताक और झांक के शौक में,
चौक में सब खड़े हो गये.

मर गये लोग भूकंप से,
फिर नये आंकड़े हो गये.

मौज आई जो कुंभकार की,
सारे ढेले घड़े हो गये.
--योगेन्द्र मौदगिल

23 comments:

gagan said...

bahut hi sunder rachna hai moudgil ji . nai no din purani so din.

खुशदीप सहगल said...

मौज आई जो सियासत के सरदारों की,
सारे नेता-पुत्र एमपी-एमएलए हो गए...

जय हिंद...

राजीव तनेजा said...

आपकी हर रचना व्यंग्य से लबरेज़ होती है... बहुत बढिया

पी.सी.गोदियाल said...

कविता में सुन्दर चित्रण बड़े बाप के बिगडैल बेटे का

Mrs. Asha Joglekar said...

मर गये लोग भूकंप से
फिर नये आंकडे हो गये ।
हादसे हमारे यहां आंकडों में ही तबदील हो जाते हैं वे भी दो तरह के सरकारी और गैर सरकारी । जबरदस्त कविता ।

नीरज गोस्वामी said...

ग़ज़ब...भाई जी ग़ज़ब...क्या ग़ज़ल कही है...सुभान अल्लाह जितनी बार भी कहूँ कम ही पड़ेगा इस के लिए...हर शेर जान दार है...गज़ब भाई जी गज़ब...
नीरज

सुलभ सतरंगी said...

सभी शेर भली लगी. शुक्रिया !

मेरे कान खरे हो गए

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत नायाब, शुभकामनाएं.

रामराम.

Mishra Pankaj said...

मोदगिल जी सुन्दर और सरस व्यंग

Anil Pusadkar said...

आपकी जितनी भी तारीफ़ की जाये ऐसा लगता है कि कम ही है।

महफूज़ अली said...

Bahut sunder chitran kiya hai aapne.......


NAMASKAR......


JAI HIND,
JAI HINDI,
JAI BHARAT.......

परमजीत बाली said...

व्यंग्य रचना मे सामयिकता व तीखेपन को जोड़ कर बहुत बेहतरीन रचना रच देते हैं आप।बधाई स्वीकारें।

पंकज सुबीर said...

आदरणीय योगेंद्र जी अपने ब्‍लाग पर आपने जो महुआ घटवारिन का जिक्र किया है उसने ह्रदय को छू लिया । सचमुच ही ऐसा लग रहा है कि जैसे सब एक ही परिवार है । आशा है स्‍नेह बना रहेगा । और आपकी ग़ज़ल का क्‍या कहूं हमेशा की ही तरह धारदार और पैनी । क्‍या आप गद्य में भी व्‍यंग्‍य लिखते हैं । क्‍योंकि आपकी भाषा बहुत ही विशिष्‍ट है उसी प्रकार जैसे गद्य में होती है । मतला एक विशिष्‍ट तंज लिये है जो हर किसी पर सटीक बैठता है । आप इसी प्रकार लिखते रहें ।
सुबीर

ओम आर्य said...

बहुत ही सुन्दर योगेन्द्र जी........आपका रचना संसार बहुत ही विस्तृत है ..........सादर
ओम

दिगम्बर नासवा said...

आपके पास तो वैसे होई इतना खजाना है की खाली नहीं होगा .... बहुत ही लाजवाब शेर हैं आपके अपने अंदाज के ... मज़ा आ गया गुरुदेव ............

योगेश स्वप्न said...

wah maudgil ji, beshkeemti rachna.

अभिषेक ओझा said...

'सारे ढेले घड़े हो गये' वाह !

विनोद कुमार पांडेय said...

इस कविता को कहाँ से ढूढ़ कर निकाले,
एक से बढ़ कर एक रंग प्रस्तुत कर डाले,

बहुत बढ़िया कविता ताऊ जी..बधाई

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर जी, लेकिन हम तो डर ही गये थे थाने दार के संग आप को देख कर, लेकिन आप का लेख ओर कविता पढ कर सांस आई, भगवान का शुक्र जी :)

श्रद्धा जैन said...

Bahut gahri gazal hai aapki .....
ek ek sher bahut pasand aaya
khas kar ..... mar gaye log bhukamp se .....

शारदा अरोरा said...

bahut khoob , saare dhele ghade ho gaye ne to khoob hansaaya

काजल कुमार Kajal Kumar said...

कोई बात नहीं...बस कुछ दिन की बात है आप भी फिर ढेलों को घड़ों में परिवर्तित करते हुए पाएंगे स्वयं को..

sangeeta said...

achchha vyang hai....aapko padh kar aanand aaya....