वक्त है कुछ सोच अंबर के लिये......


आप सब के लिये एक ग़ज़ल लेकर हाज़िर हूं............

बारी-बारी लोग मरते ही रहे,
कोई मस्ज़िद कोई मंदर के लिये.

उम्र भर घर में रहा लेकिन मुझे,
स्वप्न आते ही रहे घर के लिये.

आबरू से बेशकीमत लाल को,
बेच डाला तूने कंकर के लिये.

ये है कलियुग काम पत्थर से चला,
ताकना मत बाट गौहर के लिये.

धीरे-धीरे फूंक डाला ज़िस्म को,
वासनाऒं के बवंडर के लिये.

आजमाये कौन मन की योजना,
लोग चिंतित तन के पिंजर के लिये.

आदमी के पाप ले बहती रही,
हर नदी सीधे समंदर के लिये.

भू को बंजर कर दिया पर 'मौदगिल'
वक्त है कुछ सोच अंबर के लिये.
--योगेन्द्र मौदगिल

36 comments:

अजय कुमार झा said...

यूं कहां बयां कर पाता है हर कोई,
मुमकिन है तोम किसी धुरंधर के लिये॥


मौदगिल जी ...बहुत ही सुंदर गज़ले हैं जी...और क्यों हैं ये हमने भी बता दिया है..

अजय कुमार झा

Arvind Mishra said...

बहुत जबर्दस्त रचना मौदगिल जी -ह्रदय को बेध गयी
हर शेर अपने आपमें एक नया युग बोध लिए हुए !

वाणी गीत said...

घर में रहते घर के सपने देखना ...भू को बंजर करने के बाद अम्बर की सोचना ...
अच्छी ग़ज़ल ..!!

विनोद कुमार पांडेय said...

एक खूबसूरत रचना..एक से बढ़ कर एक पंक्तियाँ...सुंदर भाव ..धन्यवाद योगेंद्र जी..

संगीता पुरी said...

बहुत बढिया रचना !!

Kishore Choudhary said...

आजमाए कौन मन की...

वाह वाह बहुत गहरी बात ! ग़ज़ल के सब शेर बहुत उम्दा है बधाई !

पी.सी.गोदियाल said...

भू को तो बंजर कर ही दिया मौदगिल,
अब कुछ सोच अम्बर के लिए

बहुत खूब मौदगिल साहब !

AlbelaKhatri.com said...

बेहतरीन ग़ज़ल कही.योगेन्द्र जी..........

बधाई !

राजीव तनेजा said...

गाम्भीर्य को अपने में समेटे सुन्दर गज़ल

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत गहरी बात कही.

रामराम.

P.N. Subramanian said...

हीरा तो यहाँ है जी. बहुत सुन्दर. आभार.इतनी अच्छी रचना के लिए.

Anil Pusadkar said...

मह्त्वाकांक्षाओं की उड़ान इतनी ऊंची है के,
लगता नही कि बच पायेगा अंबर,इंसान से।

बहुत खूब योगेन्द्र भाई।

अजय कुमार said...

सुन्दर भावों से सुसज्जित रचना के लिए बधाई

Dr. kavita 'kiran' (poetess) said...

umda gazal ke liye badhai weekren.

गौतम राजरिशी said...

लाजवाब गुरूवर...अनूठे शेर...

"आजमाये कौन मन की योजना/लोग चिंतित तन के पिंजर के लिये"...एकदम नायाब शेर!

नीरज गोस्वामी said...

नए भाव नया तेवर नया अंदाज़...भा गया दिल को कसम से...वाह...
नीरज

sada said...

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना, बेहतरीन पंक्तियों के साथ बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

अजित वडनेरकर said...

दमदार ग़ज़ल।

रानी पात्रिक said...

आदमी के पाप ले बहती रही
हर नदी समन्दर के लिए

बहुत खूब। यूँ तो पूरी कविता ही सुन्दर है। आदमी अभी भी सुधर जाए तो अच्छा है।

BAD FAITH said...

एक खूबसूरत रचना
आदमी के पाप ले बहती रही
हर नदी समन्दर के लिए. कमाल है.

सुलभ सतरंगी said...

आदमी के पाप ले बहती रही,
हर नदी सीधे समंदर के लिये.

भू को बंजर कर दिया पर 'मौदगिल'
वक्त है कुछ सोच अंबर के लिये.

बहुत खूब.

sanjay vyas said...

बहुत उम्दा रचना सर.शाश्वत चिंताओं का शाश्वत मूल्य लिए चिंतन.

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

आजमाये कौन मन की योजना
लोग चिंतित तन के पिंजर के लिये ।।

आज तो आपने कमाल ही कर डाला... तारीफ के लिए शब्दों का चुनाव ही नहीं कर पा रहा हूँ ।

रंजना said...

Harek sher hee gahre bhaav liye.. bahut hi sundar rachna...sadaiv ki bhanti .....
Aanand aa gaya padhkar...Aabhaar.

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर गजल.
धन्यवाद

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर गजल.
धन्यवाद

Dr. kavita 'kiran' (poetess) said...

aap blog per aaye shukriya.mere no' hain-o9414523730 aur 09829317780.pat hai-dr kavita'kiran'nehru colony,falna-306116(raj)
plz aapka pata bhi choden.

योगेश स्वप्न said...

bahut khoob mudgil ji, hamesha ki tarah lajawaab.

Mrs. Asha Joglekar said...

एक से एक लाजवाब शेरों से बनी ये गजल एक हीरों का हार बन गई है ।

रचना गौड़ ’भारती’ said...

एक बेहतरीन रचना ।
बधाई ।

Harkirat Haqeer said...

सुभानाल्लाह......!!

योगेन्द्र जी ये चहरे में इतना परिवर्तन कैसे ....??

बस यही देखने चली आई .....आप वही हास्य लेखन वाले मौदगिल ही हैं न ....????

सुशील कुमार छौक्कर said...

बहुत बेहतरीन गजल एक नय रंग और अंदाज में।

विवेक सिंह said...

बहुतखूब ।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

भाई आपकी यह रचना कबीर के बहुत पास है. शुभकामनाएं.

M VERMA said...

आबरू से बेशकीमती लाल को,
बेच डाला तूने कंकर के लिये.
विरोधाभाषी तेवर की गजल. बहुत सुन्दर

चच्चा टिप्पू सिंह said...

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