कुछ दोहे

घर का भेदी तोड़ कर, लंका लीनी जीत.
जा हमने भी देख ली, रघुकुल तेरी रीत..

भ्रष्ट राजनीति हुई, चौपट हुआ समाज.
हर वानर को चाहिये, किष्किन्धा का राज..

नयी नस्ल की देखिये, कितनी ऊंची कूद.
बच्चे भी रखने लगे, बस्तों में बारूद..

हाथ-पांव ढीले पड़े, मुरझा गया शरीर.
बेटे बोले बाप से, खिंचवा ले तस्वीर..

मात्-पिता हर्षित हुए, गये दिनों को भूल.
दसवीं फेल सपूत ने, खोला पब्लिक स्कूल..

दिल्ली के दरबार में, बर्बरता का राज.
बायें रक्त-पिशाच हैं, दायें अर्थ-पिशाच..

सोया गहरी नींद में, घर का सिरजनहार..
अगल-बगल के भेड़िये, नाप रहे दीवार..

गंगा-यमुना झेलती, पोल्यूशन की मार.
पेप्सी ले कर हाथ में, झूम रही सरकार..
--योगेन्द्र मौदगिल

29 comments:

मीत said...

सही मार है सरकार.

mehek said...

waah ek se badkar ek,bahut khub

Arvind Mishra said...

खूब भई खूब !
मौदगिल भाई की कविताई भी क्या खूब
रीती हथेली पर भी उग उग आये दूब

डॉ मनोज मिश्र said...

हर बानर को चाहिए ,किस्किन्धा का राज ...वाह सटीक रचना -सटीक चिंतन .

SWAPN said...

ek se badhkar ek dohe, kamaal ka likhte hain maudgil ji, saraswati man ka poora ashirwad hai, rahna bhi chahiye, shubh kaamna.

Ratan Singh Shekhawat said...

बहुत ही व्यंगात्मक और सटीक दोहे

"अर्श" said...

kamaal ho gaya huzur is baargi dohe se hi lapeta sabko aur lagaya fir se kas ke ....

haath pawon dhile pade....

is dohe ke baare me kya kahun bahot hi shaandaar lagaya hai aapne...

dhero badhaaee naye FY me aapko...

arsh

P.N. Subramanian said...

पेप्सी लेकर हाथ में (मदिरा मिलाकर) !

Anil Pusadkar said...

गज़ब मार करते है आपके शब्द-बाण्।

ताऊ रामपुरिया said...

सटीक और लाजवाब व्यंग.

रामराम.

*KHUSHI* said...

vyang mai aapne haste haste sacchai batadi. aap ki taarif mai aur kya kahe, shabd bhi kam pad rahe hai.

Science Bloggers Association said...

परम्‍परा के विरूद्ध जाने का साहस दिखाते हुए आपने इस गजल के माध्‍यम से बडी बात कही है, बधाई स्‍वीकारें।

-----------
तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

Mumukshh Ki Rachanain said...

भाई जी,
प्रथम अप्रैल की पूर्व संध्या पर खूब अच्छा तोहफा दिया, कंहा तो हम नीरज जी से "मूरखता के दोहो" की पुनः उम्मीद कर रहे थे पर आप एक हाथ आगे निकल गए. पूर्व संध्या पर ही अवतरित हो गए.

सुन्दर, चुटीले, तेज़ तर्रार दोहों की प्रस्तुति पर आपको हार्दिक आभार.

मेरे ब्लॉग पर आज की ताज़ा पोस्ट पर भी कुछ ऐसे ही दोहे अवतरित हुए हैं उन पर भी व्यंग-बाण रूपी प्रतिक्रियायों का स्वागत है.

चन्द्र मोहन गुप्त

अशोक पाण्डेय said...

बहुत खूब भाई मौदगिल जी। हमेशा की तरह जोरदार रचनाएं।

दिगम्बर नासवा said...

मोदगिल साहब
कबीर की दोहों की याद दिला दी ..............
बहुत ही पैनी धार से काटा है आपने राजनीति, समाज की कुरीती को

आलोक सिंह said...

वाह एक एक पंक्ति चुन-चुन कर लिखी है .
धन्यवाद

नीरज गोस्वामी said...

भाईजी जब तक आपके चरण कमल दूर हैं तब तक के लिए अपनी खडाऊ ही भेज दो...उसे ही पूजते रहेंगे...सर माथे पे रख कर....क्या दोहे लिखें हैं ...वाह...एक से बढ़ कर एक...जय हो भाई जी जय हो....
नीरज

मोहन वशिष्‍ठ said...

वाह जी वाह बिल्‍कुल सत्‍यता पर आधारित है आपकी रचना
आज कल येही होता है पढे लिखे हैं नहीं चलो स्‍कूल खोल देते हैं पैसा होता ही है पास में और फिर बढाते जाते हैं दुकानदारी

परमजीत बाली said...

वाह! बहुत बढिया!!

परमजीत बाली said...

वाह! बहुत बढिया!!

अमिताभ श्रीवास्तव said...

kyaa baat he janaab....

" aapki baat par lagati he tantra par chot
soch le janta ab, kise denaa he vot?"

bahut nirale he aap..maza aa gaya..

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

भई वाह्! बेहद उम्दा व्यंग्य रचना....बधाई

Dr. Amar Jyoti said...

सटीक व्यंग!
बधाई।

Shefali Pande said...

बहुत अच्छा लिखा ...बधाई

sandhyagupta said...

गंगा-यमुना झेलती, पोल्यूशन की मार.
पेप्सी ले कर हाथ में, झूम रही सरकार..

Hamesha ki tarah bahut achche.

राजीव तनेजा said...

हर दोहा एक से बढकर एक...
तीखे...नुकीले और सुरीले कटाक्ष

राज भाटिय़ा said...

भ्रष्ट राजनीति हुई, चौपट हुआ समाज.
हर वानर को चाहिये, किष्किन्धा का राज..
अरे बाबा क्यो खींच रहे हो इन नंगे वानरो की पूंछ.
बहुत ही सुंदर.
धन्यवाद

रविकांत पाण्डेय said...

हर वानर को चाहिये किष्किंधा का राज....वाह वाह!! बेहद प्रासंगिक।

RC said...

Too Good! Loved first, second and fourth ones a lot!

God bless
RC
(my blog's link has changed - parastish.blogspot.com)