कौन कहता है..........

कौन कहता है, हमारी बात में पावर नहीं.
सच तो ये है जांचने का आपको अवसर नहीं.

कोई अपना हो न हो, किसको फिकर इस बात की,
वो कहीं जाते तो होंगें, जिनका कोई घर नहीं.

उपहार में भी जख़्म देना, आजकल फैशन हुआ,
बिक गये वो लोग जिनकी बात में तेवर नहीं.

मन का भारीपन दिखाना, यार को भारी लगा,
बात सीना तान कहता हूं, कभी गिरकर नहीं.

चार दिन की ज़िंदगी में ढाई दिन के चोंचले,
बिस्तरे की सलवटें बनती कभी ज़ेवर नहीं.

तुम मेरा ईमान बांचो, मैं तुम्हारे प्यार को,
फिर न कहना आजकल मिलता कोई आकर नहीं.

आज कह दी है ग़ज़ल हमने किसी के वास्ते,
लाख वो कहता रहे कि ये ग़ज़ल हम पर नहीं.

अपने-अपने रास्तों के ज़ख्म अपने हैं मियां,
अपनी ही औक़ात से क़द आपका ऊपर नहीं.

मिल गये तो मिल गये और ना मिले तो ना मिले,
नर्क जीकर भी नहीं और स्वर्ग भी मर कर नहीं.

मन से रिश्तों को निभाना आजकल हठयोग है,
भावना अच्छी रहे बस उस से कुछ बेहतर नहीं.

ताश के पत्ते लगाने आ गये पर 'मौदगिल',
कैसे जम पायेगी रम्मी, एक भी जोकर नहीं
--योगेन्द्र मौदगिल

32 comments:

रविकांत पाण्डेय said...

वाह! वाह! आनंदित कर देनेवाली रचना। एक सांस में पढ़ गया।

Arvind Mishra said...

वाह ! अच्छी व्यंगोक्तियाँ ,उलाहने और अनुरोध !

"अर्श" said...

मौदगिल साहब हर शे'र उम्दा किसे कहूँ के कौन कैसा है बहोत ही खूब कही आपने इस बार भी वह मज़ा आगया ...
मिल गए तो मिल गए और ना मिले तो ना मिले वाला शे'र तो खासा है ...बेहद उम्दा साहब...

ढेरो बधाई कुबूल करें....

अर्श

विनय said...

सलवटें और ज़ेवर, वाह साहब!

---मेरा पृष्ठ
गुलाबी कोंपलें

गौतम राजरिशी said...

अभी तो वो पहले वाली गज़ल पढ़ कर हटा कि ये एक और तेवर वाली आ धमकी...
सुभानल्लाह सर
आज कह दी है गज़ल हमने किसी के वास्ते / लाख वो कहता रहे कि ये गज़ल हम पर नहीं...

सुभानल्लाह सर...इस शेर पर मैम की प्रतिक्रिया क्या रही?

P.N. Subramanian said...

माशा अल्लाह क्या क्या बातें एक साथ कह दी. "कैसे जम पायेगी रम्मी, एक भी जोकर नहीं"

Ham aur aap to hain hi. abhar.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

उम्दा रचना है। यथार्थ कह दिया है आपने सलीके से।

विवेक सिंह said...

वाह जी वाह मजा आ गया !

राज भाटिय़ा said...

आप के शेरो मै हमेशा एक सच झलकता है, आज भी आप ने हर शेर मै सच ही कहा है.
धन्यवाद

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आपसे एक अनुरोध है कि
आप कविता की
पोड कास्ट भी कर देँ
और आनँद आयेगा -
ये कविता सच बयानी सी लगी -
स स्नेह,
- लावण्या

COMMON MAN said...

हमेशा की तरह बहुत अच्छी कविता

Vijay Kumar Sappatti said...

yogendra ji , kya baat hai ,, bahut khoob ..

itne ache andaaj mein aapne apni baat kahi , wah wah .. mujhe saare sher pasand aaye..

badhai ..

mujhe aapki kitaab chahiye thi , maine mail bi bheja tha , aapko , kuch bataye ..

maine kuch nai nazme likhi hai ,dekhiyenga jarur.


vijay
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अभिषेक ओझा said...

'उपहार में भी जख़्म देना, आजकल फैशन हुआ,
बिक गये वो लोग जिनकी बात में तेवर नहीं.' लावण्या जी की सलाह पर ध्यान दिया जाय. प्लीज. आपकी जबान से सुनाने की इच्छा प्रबल हो रही है.

ताऊ रामपुरिया said...

बेहद सच सच कहती रचना.

रामराम.

makrand said...

ताश के पत्ते लगाने आ गये पर 'मौदगिल',
कैसे जम पायेगी रम्मी, एक भी जोकर नहीं

bahut umda

RC said...

"koi apna na ho ... ",
"Char din ki zindagi - "
"hath yog"
and best is - Maktaa
... Bahut badhiya She'r!!

"Aaj keh di hai" - Pehla misra khoobsoorat, magar Saani padhne ke baad Sher mein utna dum nahi laga :(

Kuchh Asharon mein lay gadbad lag rahi hai ..... ex these Sher - girkar nahin, zevar nahi ... (I know, chhota mooh badi baat, main khud lay mein nahin likhti!! Magar samajhti hoon aur baat satya kehti hoon!)

God bless
RC

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

अजी मोदगिल जी, इब्बी तक तो थारी पिछली पोस्ट का ससूर बी कोणी उतरया अर गेल्लै ही दूसरी धांसू गजल चिपका दी.
अजी थारा बी जवाब कोणी........

जितेन्द़ भगत said...

वो कहीं जाते तो होंगें, जिनका कोई घर नहीं.....
सोचने पर मजबूर कर दि‍या आपने।
बहुत अच्‍छी रचना।

दिगम्बर नासवा said...

मोदगिल साहब................एक से बढ़कर एक............दनादन गोले बरसा रहे हो सच्चाई के, बहुत तेज़ धार है आपकी मज़ा आ जाता है आपके ब्लॉग पर आ कर

डॉ .अनुराग said...

बहुत खूब......पर इन दिनों तो ढेर सारे जोकर है इस जहाँ मे.....बादशाह ढूंढ़ना अलबत्ता मुश्किल है.....(वैसे आपका इशारा हँसी पर है....)

shama said...

Yogendraji,
Aapkee rachnaape mai tippanee karun, itnee qabiliyat mujhme kahan ? Isliye aksar chupchaap aake nikal jaatee hun...par aaj raha na gaya...kuchh aise alfaaz padhe jo aaj mere jeevankaa saty bane hue hain,"Uphaarmebhee zakhma dena...",
"Man kaa bhareepan dikhaana, yaarkobhee bharee lagaa"...nishabd hun, jaise kiseene mere manko padhke likh diya ho...

विनय said...

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ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

समसामयिक प्रभावों से परिपूर्ण एक सार्थक गजल, बधाई।

रंजना said...

वाह ! वाह ! वाह ! आनंद आ गया ! लाजवाब

Udan Tashtari said...

वाह जी वाह!! क्या बात है..हर एक शेर उम्दा!!

Dr.Bhawna said...

चार दिन की ज़िंदगी में ढाई दिन के चोंचले,
बिस्तरे की सलवटें बनती कभी ज़ेवर नहीं.

तुम मेरा ईमान बांचो, मैं तुम्हारे प्यार को,
फिर न कहना आजकल मिलता कोई आकर नहीं.

आज कह दी है ग़ज़ल हमने किसी के वास्ते,
लाख वो कहता रहे कि ये ग़ज़ल हम पर नहीं.

अपने-अपने रास्तों के ज़ख्म अपने हैं मियां,
अपनी ही औक़ात से क़द आपका ऊपर नहीं.

मिल गये तो मिल गये और ना मिले तो ना मिले,
नर्क जीकर भी नहीं और स्वर्ग भी मर कर नहीं.

मन से रिश्तों को निभाना आजकल हठयोग है,
भावना अच्छी रहे बस उस से कुछ बेहतर नहीं.

सभी एक से बढ़कर एक किस-किस की तारीफ की जाये ...बहुत-२ बधाई ...आपने जो मेरी पोस्ट पर टिप्पणी दी है कबूतर वाली वो बहुत अच्छी लगी धन्यवाद...

विनय said...

मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ
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hem pandey said...

एक और सुंदर प्रस्तुति. साधुवाद.

Dev said...

आपको लोहडी और मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ....

vikram7 said...

मन से रिश्तों को निभाना आजकल हठयोग है,
भावना अच्छी रहे बस उस से कुछ बेहतर नहीं

अति सुन्दर रचना बधाई

विक्रम सिंह

sandhyagupta said...

Hamesha ki tarah sundar.

बवाल said...

नर्क जीकर भी नहीं और स्वर्ग भी मर कर नहीं.
ग़ज़ब की ग़ज़ल फेर दी योगी बड्डे ! सच बताऊँ इतने उम्दा ख़यालात दिखलाए हैं आपने इसमें के लग रहा है आपसे इसे मोल ले लूँ और हमेशा के लिए अपने पास रख लूँ। बहुत बहुत और बहुत ख़ूब !
बात सीना तान कहता हूं, कभी गिरकर नहीं. अहा !