क्षणिकाएं


पंडित जी
अब किस से कम
मूंह में राम
हाथ में रम


आदमी सस्ता
महंगा राशन
धन्य है परजा
धन्य है शासन


उनको बचपन से ही
आदत है
कमीशन खाने की
इसीलिये
पत्नी ने तौबा कर रखी है
बाज़ार से
सामान मंगवाने की


मां-बेटी को आधुनिकता
इतनी रास आई
कि गजब हो गया
बेटी ने प्यार किया
ब्याह
मां का हो गया
--योगेन्द्र मौदगिल

10 comments:

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

जबरदस्त!! कम शब्दो में धारधार क्षणिकाएं लिखी आपने.. बहुत बहुत बधाई

Anil Pusadkar said...

gazab kar diya,bina kapda utaare sabko nanga kar diya.bahut bahut bahut sunder

योगेन्द्र मौदगिल said...

कुश भाई,
आपका ब्लाग दीख नहीं रहा..
बहुत बेहतर काम था आपका.
प्रतीक्षा है..
फिलहाल धन्यवाद.

अनिल जी, आप भी बड़ी शिद्दत से पढ़ते hain
आपकी पाठकीयता को नमन.

seema gupta said...

उनको बचपन से ही
आदत है
कमीशन खाने की
इसीलिये
पत्नी ने तौबा कर रखी है
बाज़ार से
सामान मंगवाने की
" ha ha ha ha ha patnee ne kya khub bachpan kee unkee aadet ko apnaya hai, isko kehten hain patnee hone ka dharm neebaya hai"
Regards

मीत said...

बहुत बढ़िया है भाई .... सारी की सारी.

बालकिशन said...

जोरदार और धारदार लिखा सरजी.
पढ़कर
आनंद ही आनंद है.

P. C. Rampuria said...

भाई घणी तगडी धार सै ! थारी
ताई तो थारी क्षनीकाओं तैं ही
सब्जी काट लिया करै सै आजकल !
चलो चाकू का खर्चा बचा ! :)
बहुत गजब और सटीक ! बधाई !

योगेन्द्र मौदगिल said...

सीमा जी, मीत जी, बालकिशन जी,
आपके बरकरार प्रेम से अभिभूत हूं.

अर् ताऊ,
ताई का काम मेरी क्षणिकाऒं तै चालजै..
होर के चहिये...
ईब तो बल्ले-बल्ले....

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

योगेन्द्र भाई,
जीवन की सच्चाई
इतने कम शब्दों में
फिट कैसे कराई?

vinayprajapati said...

bahut achchhe saahab bahut achchhe!