ग ज ल

दहशतज़दा हैं लोग, आखिर हो रहा है क्या ?
इंसान का इंसानियत से वास्ता है क्या ?

सुनता नहीं दुआएं वो भी अम्नोंचैन की,
इन क़ातिलों की कौम का बहरा खुदा है क्या ?

सत्ता की चरबी चढ़ रही है आंख-आंख में,
मैं सोचता हूं देश ये अंधा हुआ है क्या ?

विस्फोट में चिथड़े हुए मासूम लोग ही,
जो मर गया रे फिर कभी ज़िन्दा हुआ है क्या ?

बेचैनियों के साथ जो रखता हो नफरतें,
ऐसे बशर की ज़िन्दगी का फलसफा है क्या ?

तू कौन है, मैं कौन हूं, मैं जानता नहीं,
'मौदगिल' इस बात का भई फैसला है क्या ?
---योगेन्द्र मौदगिल

10 comments:

रज़िया "राज़" said...

सुनता नहीं दुआएं वो भी अम्नोंचैन की,
इन क़ातिलों की कौम का बहरा खुदा है क्या ?
बहोत खुब कहा।क्या ईन लोगों में जज़बात जैसी कोई चीज़ ही नहिं? आपको ईस ग़मज़दा गज़ल के लिये बधाई।

महेंद्र मिश्रा said...

दहशतज़दा हैं लोग, आखिर हो रहा है क्या ?
इंसान का इंसानियत से वास्ता है क्या ?


ग़मज़दा गज़ल के लिये बधाई.

Smart Indian said...

"विस्फोट में चिथड़े हुए मासूम लोग ही,
इक बार मर गया जो वो ज़िन्दा हुआ है क्या?"

मौदगिल जी, हमारे आज की इस अफसोसनाक सच्छाई को इतनी अच्छी तरह कहने के लिए धन्यवाद.

vijaymaudgill said...

मैंने कल रात अहमदाबाद में हुए विस्फोटों के लेकर एक ग्राफिक बनाने के बाद इसी बारे में सोचता रहा कि ये सब क्या है? क्या वो सब इंसान ही हैं, जो ये सब करते हैं और आज आपकी इस ग़ज़ल ने फिर से हिला दिया।
बहुत सच्ची ग़ज़ल है।

नीरज गोस्वामी said...

सुनता नहीं दुआएं वो भी अम्नोंचैन की,
इन क़ातिलों की कौम का बहरा खुदा है क्या ?
बहुत खूब मुदगिल भाई...सच बयानी है आप की ग़ज़ल में...हर शेर सवाल करता है...जिसका जवाब देना बहुत मुश्किल है...देशात गर्दी पर एक शेर से अपनी नई ग़ज़ल के आगाज़ की बात सोच रहा था...अभी और कुछ लिखा नहीं...फिलहाल आप शेर सुनें :
कत्ल करना ही तेरा धंधा है
तू बता किस खुदा का बंदा है
नीरज

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

यह सब क्या हो रहा है, कांग्रेस के राज में? हम ग़ाफ़िल सही तो क्या सुरक्षा व्यवस्था भी लाचार है!

राज भाटिय़ा said...

सत्ता की चरबी चढ़ रही है आंख-आंख में,
मैं सोचता हूं देश ये अंधा हुआ है क्या ?
योगेन्द्र मौदगिल मे तो घर से बहुत दुर हू,लेकिन हर पल एक चिंता सताये जाती हे अपने देश की,अपने लोगो की, क्या इस सरकार ने दोवारा नही आना, क्या भारत के रहने वाले आम आदमी को जीने का खुश रहने का हक नही, क्या उसे इन्हे जीताने का ही हक हे.
बहुत कूछ कह गई आप की यह कविता, धन्यवाद

योगेन्द्र मौदगिल said...

aap sabhi ka aabhari hoon. Twarit pratikriya mansikta ko samridhh karti hai. Main or behtar kalaam dene ka prayas karoonga.

vipinkizindagi said...

बहुत अच्छी ग़ज़ल.........
बेहतरीन प्रस्तुति.............

seema gupta said...

विस्फोट में चिथड़े हुए मासूम लोग ही,
जो मर गया रे फिर कभी ज़िन्दा हुआ है क्या ?
"very painful and true'