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रामलीला मैदान में डटे शूरवीरों को समर्पित .........................

रामलीला मैदान में डटे शूरवीरों को समर्पित
आज का मुक्तक.....एक छंद के साथ

भ्रष्टों की एकता का नया वार देख लो..
सत्ता का नशा बोलता है यार देख लो..
इन सब दलों को देख के पछता रहे हैं हम,
ये कैसे-कैसे चुन लिए गद्दार देख लो..


जाति और धरम से ऊंचा है हमारा देश,
भारती की जय-जैकार मन में बसाई हो..
भ्रष्टाचार भाग जाए, स्विस-धन लौट आए,
देश में हो राम-राज दूर महंगाई हो..
छल व् प्रपंच-झूठ, राजनीति में न रहे,
जन लोकपाल बिल की ही अगुवाई हो..
संभव ये हो सकेगा जब सारे ठान लेंगे,
बच्चा-बच्चा अन्ना जी का पूरा अनुयायी हो..
--योगेन्द्र मौदगिल

गेरुआ : चार व्यंग्यचित्र


गेरुआ : चार व्यंग्यचित्र घनाक्षरी में

आज चौथा




रासलीला प्रिय मुझे, जीवन भी रास लगे,
इसीलिये क्षण-क्षण, रास रचा लेता हूं.


रुक्मिणी अपनी को, रखता हूं घर में ही,
बाहर तो बाहर की, राधा नचा लेता हूं.


चाहे गिरे बिजली, पहाड़ टूट जाये पर,
फिर भी मैं खुद को, हुजूर बचा लेता हूं.


दौर डाइटिंग का हो, अपनी रसोई में तो,
पड़ौसियों के घर की मैं, खीर पचा लेता हूं.
--योगेन्द्र मौदगिल


गेरुआ: चार व्यंग्यचित्र

गेरुआ: चार व्यंग्यचित्र-------घनाक्षरी में.....

आज तीसरा




नौकरी में भूखा रहा, बिजनेस में नंगा रहा,
अक्समात् बुद्धि आई, धार लिया गेरुआ.


फिर तो ये जीवन का, दर्शन समझ लिया,
विचार-व्यवहार में, उतार लिया गेरुआ.


मेरी कामनाएं भला, मारता वो कैसे कहो,
मेरी कामनाऒं ने ही, मार लिया गेरुआ.


गेरुए से धन आया, धन से विलास आया,
और यों विलास से ही, हार लिया गेरुआ.
--योगेन्द्र मौदगिल


गेरुआ : चार व्यंग्यचित्र



गेरुआ : चार व्यंग्यचित्र------घनाक्षरी में.......

आज दूसरा




सुबह राम बेचता हूं, सांझ श्याम बेचता हूं,
फूल, परशाद, खील, नारियल-मौली जी.


राम जी की किरपा से. काया फल-फूल रही,
भगतों को देता, राम-नाम की मैं गोली जी.


सफेद संगेमरमर, दे गये हैं काले भक्त,
उसको निहार मैं तो, भूल गया खोली जी.


कृष्णमय हो गया है, अंग-प्रत्यंग मेरा,
भगतनियों से, कर लेता हूं ठिठोली जी.
--योगेन्द्र मौदगिल

गेरुआ चार व्यंग्यचित्र



गेरुआ : चार व्यंग्यचित्र------घनाक्षरी में

आज पहला...




घर में तो एक बीवी, काटती हरेक बात,
यहां तो निहाल हूं जी, चेलियों की फौज से.

हो गया था तंग, बदरंग हो गया था मैं,
घर में गृहस्थी के, क्लेश रोज-रोज से.

गेरुआ बदनधार, मन्दिर पै कब्जा कर,
तुम भी उठा लो लाभ, मेरी इस खोज से.

काहे मन मारते हो, खीजते हो, जलते हो,
देख मेरा खान-पान, रंग-ढंग, मौज से
--योगेन्द्र मौदगिल

घनाक्षरी....




इस बार एक घनाक्षरी संभालिये साहेब




नीचे लिये मोटरसैकल, ऊपर चढ़ाये पैग,
छेड़ते हैं लड़कियां पीते-पीते सिगरेट.


रोटियों की थाली को तो 'शिट' कह दूर किया,
पूत जी ने गुटखे के साथ खाई चाकलेट.


साथियों के साथ लिये आड़ किसी दड़बे की,
गुप्तरोग माहिरों की बांच रहे बुकलेट.


घर बैठे टीवी से ही गुर सारे सीख लिये,
सनराइज़ कोठे पै तो बार में है सनसैट.
--योगेन्द्र मौदगिल