बिजली देवी की मेहरबानी आज रहने की उम्मीद है.... लेकिन आज दोपहर बाद रोहतक में कैमिस्ट एसोसियेशन द्वारा आयोजित कवि-सम्मेलन भी. अपने पसंदीदा ब्लाग्स पर जाने का बहुत मन है पर आज फिर इंतज़ार करना होगा बहरहाल आप सब के लिये एक ग़ज़ल पेश कर रहा हूं पसंद आनी चाहिये.... शेष विशेष इस के बाद...
बच्चों के अधरों पर जब भी दिखती है मुस्कान मुझे.
जाने कितने बरसों पीछे ले जाता है ध्यान मुझे.
मुट्ठी से धूएं सी यादें जाने कब की फिसल गईं,
लेकिन सपनों में दिखता है कच्चा एक मकान मुझे.
अब भी दे जाता रातों में सर्द झुरझुरी सी अक्सर,
बड़ी हवेली के आले में सैय्यद का इमकान मुझे.
वो इमली, वो बरगद-बगिया, वो कोयल, वो मंदिर-घाट,
वह पाठशाला कि जिसमें रटती थी गरदान मुझे.
आवास योजना के क्वार्टर में मेरा बेटा यों बोला,
पप्पा इक दिन दिखलाऒ ना गांव खेत खलिहान मुझे.
शहरी बनने के चक्कर में झूठ बोलना सीख गया,
अब वो चौपाली रतबतियां करती हैं हैरान मुझे.
चौका लीप रही बूआ ने मेरा माथा चूम लिया,
मेरा बेटा रहा देखता बहुत देर हैरान मुझे.
एक हीन ग्रन्थि का मारा सोच रहा मैं पड़ा पड़ा,
क्या सचमुच ही समझ लिया है बहुऒं जे महमान मुझे.
मेरे मुंह पर अक्सर उसने मुझको बहुत दुआएं दी,
पीठ मोड़ते ही कह डाला जालिम ने शैतान मुझे.
--योगेन्द्र मौदगिल