मित्रों,
आप सभी को यथायोग्य.
कुछ कविसम्मेलनीय यात्राऒं एवं अपने पानीपत सांस्कृतिक मंच के वार्षिक कवि-सम्मेलन की आयोजनीय व्यस्तताऒं के चलते १०-१२ दिन की अनुपस्थिति को उदारता पूर्वक क्षमा करें.
आज से रूटीन में आ गया हूं....
एक गज़ल पेश कर रहा हूं कि......
बढ़ रही महंगाई हम को आजमाने के लिये.
और हम ज़िन्दा हैं केवल, तिलमिलाने के लिये.
बेकसी बढ़ती रही ग़र, दाने-दाने के लिये.
तन पड़ेगा झोंकना, चूल्हा जलाने के लिये.
प्याज़ ने आंसू निकाले, देख बेसन ने कहा,
चाहिये, अब तो कलेजा हम को खाने के लिये.
कितनी ऊंची कूद मारी, इस उरद की दाल ने,
लोन ही लेना पड़ेगा दाल खाने के लिये.
सोचता हूं, वो ज़माना खूब था, हम पढ़ लिये,
दिन में तारे दिख गये, बच्चे पढ़ाने के लिये.
नौकरी जब ना मिली तो उसने किडनी बेच दी,
दो निवाले भूखे बच्चों को खिलाने के लिये.
भूख ने तड़पा दिया तो बेईमानी सीख ली,
शुक्रिया रब्बा... तिरा ! ये दिन दिखाने के लिये.
इक चटाई, एक धोती, एक छप्पर, इक घड़ा,
उम्र सारी कट गयी इन को बचाने के लिये.
बन गया मैं तो मिनिस्टर भोली जनता शुक्रिया,
मिल गया लाइसैंस अब तो देश खाने के लिये.
चंद वादे, चंद नारे, चंद चमचे, 'मौदगिल',
पर्याप्त हैं, इस देश की संसद में जाने के लिये.
--योगेन्द्र मौदगिल