पर्यावरण को समर्पित तीन छंद प्रस्तुत कर रहा हूं..........
भूमि-श्रंगार वृक्ष, उपहार प्रकृति के,
इन पर मानव का अत्याचार रोकिये.
मानते हैं बात जो दरांतियों-कुल्हाड़ियों की,
ऐसे असुरों को बेझिझक हो के टोकिये.
अब तो रे बाज आऒ, मान जाऒ, रुक जाऒ,
माफ अपराध सब, अब तक जो किये.
वृक्षों का कटान कर देगा अंत सभ्यता का,
सभ्यता के हित तत्काल इसे रोकिये....
स्वयं को शाकाहार, देंगें उपहार और,
धरती को वृक्षों का आधार देके जाएंगें.
निर्णय हमारा अब एक होना चाहिये कि,
हरी हरियाली ही अपार देके जाएंगें.
वरना ये हमने तो जैसे-तैसे काट ली है,
सोच संतान को क्या यार देके जाएंगें..?
यही हाल रहा तो नवेली सब पीढ़ियों को,
दमा-टीबी-अस्थमा उपहार दे के जाएंगें....
विषम विडम्बना में डूबा है विकासक्रम,
बूझती है पर निरूपाय मां वसुंधरा.
वृक्षों का कटान, निर्बाध देख-देख हाय,
टूक-टूक रोती, असहाय मां वसुंधरा.
गहने-लत्ते सम् तरू, लुट गये, लगती है,
नित्य तेजहीन-कृशकाय मां वसुंधरा.
यही हाल रहा तो ये कह देगी इक दिन,
दुनिया को सीधे बाय-बाय मां वसुंधरा....
--योगेन्द्र मौदगिल