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कौन कहता है..........

कौन कहता है, हमारी बात में पावर नहीं.
सच तो ये है जांचने का आपको अवसर नहीं.

कोई अपना हो न हो, किसको फिकर इस बात की,
वो कहीं जाते तो होंगें, जिनका कोई घर नहीं.

उपहार में भी जख़्म देना, आजकल फैशन हुआ,
बिक गये वो लोग जिनकी बात में तेवर नहीं.

मन का भारीपन दिखाना, यार को भारी लगा,
बात सीना तान कहता हूं, कभी गिरकर नहीं.

चार दिन की ज़िंदगी में ढाई दिन के चोंचले,
बिस्तरे की सलवटें बनती कभी ज़ेवर नहीं.

तुम मेरा ईमान बांचो, मैं तुम्हारे प्यार को,
फिर न कहना आजकल मिलता कोई आकर नहीं.

आज कह दी है ग़ज़ल हमने किसी के वास्ते,
लाख वो कहता रहे कि ये ग़ज़ल हम पर नहीं.

अपने-अपने रास्तों के ज़ख्म अपने हैं मियां,
अपनी ही औक़ात से क़द आपका ऊपर नहीं.

मिल गये तो मिल गये और ना मिले तो ना मिले,
नर्क जीकर भी नहीं और स्वर्ग भी मर कर नहीं.

मन से रिश्तों को निभाना आजकल हठयोग है,
भावना अच्छी रहे बस उस से कुछ बेहतर नहीं.

ताश के पत्ते लगाने आ गये पर 'मौदगिल',
कैसे जम पायेगी रम्मी, एक भी जोकर नहीं
--योगेन्द्र मौदगिल

बाबा...

मन भारी, तन बेदम बाबा.
सारी दुनिया मातम बाबा.

वो जख़्मों को नाप रहे हैं,
जिनके हाथों मरहम बाबा.

चैन भला क्या उसके हिस्से,
जिस के हिस्से में ग़म बाबा.

दोनों आंसू बांट रहे हैं,
क्या शोला, क्या शबनम बाबा.

आधा दरज़न बेटे फिर भी,
बाप के हिस्से आश्रम बाबा.

ना रिश्तों में गरमी बाक़ी,
ना यारी में दमख़म बाबा.

धूआं-धूआं सारी दुनिया,
बुझा-बुझा सा मौसम बाबा.

पंडित हो, मुल्ला हो, दोनों,
बेच रहे हैं तिकड़म बाबा.

नेता जब से हुये सयाने,
राजनीति है निर्मम बाबा.

अपना सपना यही 'मौदगिल',
नगरी-नगरी खुशदम बाबा.
--योगेन्द्र मौदगिल

कोई वज़ह तो है.........

कोई वज़ह तो है कि सारा शहर है सुलगा हुआ.
हर गली, हर मोड़, हर इक द्वार है पिघला हुआ.

बाज़ार में हर चीज़ के भई दाम सुन कर यूं लगे,
मस्तिष्क में रक्खा हो जैसे कोयला जलता हुआ.

राशनिंग के दौर में कुम्हला गया है आदमी,
महंगी हुई है ज़िन्दगी पर आदमी सस्ता हुआ.

मजदूर बस्ती के मुहाने, हैं मुहैय्या मयक़दे,
रात-दिन मज़दूर मिलता है वहां लुढ़का हुआ.

भूख, रोटी, नौकरी, संत्रास, कुंठा, त्रासदी,
हैं ग़ज़ल के लफ़्ज़ के अंगार है दहका हुआ.

जब से भरती हो गया अपना भतीजा 'मौदगिल'
लौटता है घर करैंसी नोट ही गिनता हुआ.
--योगेन्द्र मौदगिल

नये साल के स्वागत में....

नये साल के स्वागत में बधाई के बावजूद


दूरदर्शिनी स्वप्न-कथाएं, नये साल के स्वागत में.
घर-घर में फैशन चर्चाएं, नये साल के स्वागत में.

इंटरनेट-केबल लगवाएं, नये साल के स्वागत में.
कम्प्यूटर पर इश्क लड़ाएं, नये साल के स्वागत में.

जोगी, साधु, पंडित, मुल्ला, नेता, अभिनेता, वेश्या,
खुल कर खेलें, खुल कर खाएं, नये साल के स्वागत में.

दारू की मस्ती का आलम, देख दंग है दादा जी,
रोज शाम पोते घुड़काएं, नये साल के स्वागत में.

हमें पता है उनकी फितरत, धोखा, तिकड़म, मक्कारी,
दाएं-बाएं, दसों दिसाएं, नये साल के स्वागत में.

महंगाई ने सीना-सीना, छलनी-छलनी कर डाला,
घर-घर में अश्रुगाथाएं, नये साल के स्वागत में.

दया, धर्म, मोह, माया, ममता, गायब हुए ज़माने से,
अंधी पीसे, कुत्ते खाएं, नये साल के स्वागत में.

चोरी, हेराफेरी, दंगा, उत्पीड़न, देह का धंदा,
सीखें और सबको सिखलाएं, नये साल के स्वागत में.

संभव हो तो रखो, बचा कर, थोड़ी शर्म उजाले की,
अंधेरे आकर समझाएं नये साल के स्वागत में.
--योगेन्द्र मौदगिल

नज़ारे दूर के होंगें.............

कुल्हाड़ी देख कर सिज़दा नहीं सीना किया होगा.
ये जंगल की हक़ीकत है, नगर को भी पता होगा.

कईं सरगोशियां, आपस में, दीवारों ने की होंगी,
खुले सेहनों का ये बेबाकपन सब को खला होगा.

नज़ारे दूर के होंगें, परों की फड़फड़ाहट में,
कबूतर गुम्बदों से जब निकल ऊपर उड़ा होगा.

खिजां से क्या गिला करना, बहारें फिर भी आएंगी,
मैं मौसम हूं, यक़ीनन तू भी मुझमें आशना होगा.

बचा रखना, वज़ूद अपना, जरूरी है ज़माने में,
सितारों, जुगनुऒं से ये सलीका सीखना होगा.
--योगेन्द्र मौदगिल