Showing posts with label गजलसर्वाधिकार सुरक्षित. Show all posts
Showing posts with label गजलसर्वाधिकार सुरक्षित. Show all posts

खुदा हूं देवता हूं

खुली आंखों से सपने देखता हूं.
मैं नज़रों को नज़ारे बेचता हूं.

रुको, मत पांव कश्ती पर टिकाना,
मैं लहरों को किनारे भेजता हूं.

तुम अपनी आंख के जाले से पूछो,
मैं ऐसा कब हूं जैसा दीखता हूं.

न जाने किस नशे आजकल हूं ?
मैं खुद को भी उसी से पूछता हूं.

वक्त मेरा बिगाड़ेगा भला क्या,
मैं माझी हूं, खुदा हूं, देवता हूं.

करेंगें नुक्ताचीनी करने वाले,
ना मुड़ता हूं न मुड़कर देखता हूं.

किसी को गर्ज़ रहती हो रहे, मैं,
गीली धरती पे अंबर ऒढ़ता हूं.

यक़ीनन झूठ से है रिस्तेदारी,
अमूमन रात-दिन सच बोलता हूं.

लगा कर चार गमले छत के ऊपर,
मुसल्सल घर में जंगल ढूंढता हूं.

अदब, आदाब, इज्जत, मा-बदौलत,
नयी पीढ़ी से रुखसत देखता हूं.

अजब हूं मैं जमाने में बिरादर,
के आंखों में हया को ढूंढता हूं.

मैं बातों में तुम्हारी आ गया हूं,
तभी तो तुझ में खुद को खोजता हूं.

मैं खुद को ही नहीं पहचान पाता,
कसम से रोज शीशा देखता हूं.
--योगेन्द्र मौदगिल