दोस्ती की आंख में दुर्भावना है मित्रवर.
चूंकि बालि-वध कथा अभिव्यंजना है मित्रवर.
मृत्यु के संग सरहदों पर गूंजता जयघोष है,
साधकों की सच यही संसाधना है मित्रवर.
आंख से अब नेह की बदली बरसती ही नहीं,
वासना की इस कदर प्रस्तावना है मित्रवर.
देश में हर देशवासी चैन से, सुख से रहे,
है यही शुभकामना, यह प्रार्थना है मित्रवर.
राबतें हैं, ख़लवतें हैं, होश के बिन जोश है,
आस का पंछी जनम से अनमना है मित्रवर.
अब तो समझौते निभाने का किया है फैसला,
अब कहीं जाकर के घर में घर बना है मित्रवर.
गालियां देकर मुझे वो सो ना पाया रात भर,
गर्व के पीछे जरूरी वेदना है मित्रवर.
सोचता हूं देख कर दुनिया की हालत 'मौदगिल'
अच्छा है हद्देनज़र कोहरा घना है मित्रवर.
--योगेन्द्र मौदगिल
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नंगा लगता है...........
वो भी मुझ जैसा लगता है.
शीशे में उतरा लगता है.
रोज टूटता बीच-बिचाले,
औरत का सपना लगता है.
खेल-खेल में टूट न जाना,
जुड़ने में वक्फ़ा लगता है.
बूढ़ी विधवा, टूटी लाठी,
दुक्खों का मेला लगता है.
गुम्बद, कंगूरे सिंदूरी..
सूरज घर लौटा लगता है.
इसको पानी देना री बहुऒं..!
ये पीपल प्यासा लगता है.
देख रहा टुक गहरे-गहरे,
अपनों का मारा लगता है.
रौशन हैं यों तो दीवारें,
लेकिन घर सूना लगता है.
जब भी तेरे सामने आया,
वक्त कहीं ठहरा लगता है.
बापू पैताने-सिर बेटा,
घर बदला-बदला लगता है.
खादी से तन ढांप लिया पर,
अब भी वो नंगा लगता है.
बंधन कितना पक्का यारों,
दिखने में धागा लगता है.
--योगेन्द्र मौदगिल
गजल सर्वाधिकार सुरक्षित
शीशे में उतरा लगता है.
रोज टूटता बीच-बिचाले,
औरत का सपना लगता है.
खेल-खेल में टूट न जाना,
जुड़ने में वक्फ़ा लगता है.
बूढ़ी विधवा, टूटी लाठी,
दुक्खों का मेला लगता है.
गुम्बद, कंगूरे सिंदूरी..
सूरज घर लौटा लगता है.
इसको पानी देना री बहुऒं..!
ये पीपल प्यासा लगता है.
देख रहा टुक गहरे-गहरे,
अपनों का मारा लगता है.
रौशन हैं यों तो दीवारें,
लेकिन घर सूना लगता है.
जब भी तेरे सामने आया,
वक्त कहीं ठहरा लगता है.
बापू पैताने-सिर बेटा,
घर बदला-बदला लगता है.
खादी से तन ढांप लिया पर,
अब भी वो नंगा लगता है.
बंधन कितना पक्का यारों,
दिखने में धागा लगता है.
--योगेन्द्र मौदगिल
गजल सर्वाधिकार सुरक्षित
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