और कुछ चलता नहीं 'किरपा' का धंदा खोल ले

 मित्रों
२८ फ़रवरी से १५ मार्च तक की घनघोर 
कविसम्मेल्नीय व्यस्तता में फेसबुक और ब्लाग 
दोनों पर ही उपस्तिथि नगण्य रही...
 आज एक मंचीय रचना के साथ कुछ दिन साथ रहने का इरादा लिए उपस्थित हूँ....

नींद में पलकें झपकते शेर कह डाले मियां.
वज्न फड-फड फडफडाया बहर के लाले मियां

दाल-रोटी की छपी फोटो बहुत अच्छी लगे
अब तो बस अखबार की चित्रावली खा ले मियां

धन का दरिया बांधते व्यापारियों से पूछ ले
कर की छलनी से निकलते कैसे पतनाले मियां

यूरिया से मुस्कुरा करके रिफ़ाइन्ड ने कहा
कौन कहता है पड़े हैं दूध के लाले मियां

मेरी बीवी ने मुझे झकझोर कर पलटा, कहा,
या तो ला राशन या ला दे घर में अब ताले मियां

टेलीवीज़न खोल कर भी क्यों पड़ा मुर्दे सा है
जिन्दा रहने के भरम में नाच ले- गा ले मियां

और कुछ चलता नहीं 'किरपा' का धंदा खोल ले
बैठ सिंघासन पी 'मुदगिल'  'किरपा' बरसा ले मियां
--योगेन्द्र मौदगिल.
09896202929
 

7 comments:

kunwarji's said...

jai ho....
uriya or refind ki jugalbandi lajawab rahi...

kunwar ji

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

yogendr babaa kee jay

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

अरे साहब आप भी कहाँ चले जाते हैं. हम पर भी किरपा कर दिया कीजिये.

रविकर फैजाबादी said...

बढ़िया प्रस्तुति ।
बधाई ।।

डा. अरुणा कपूर. said...

वाह, वाह!...क्या बात है!...किरपा का धंदा बेस्ट!...बढ़िया व्यंग्य!

Sunil Kumar said...

व्यंग्य से अपनी बात कहना भी कला है , बधाई

प्रवीण पाण्डेय said...

यूरिया तो आजकल सबकुछ पैदा करने लग गया है।