खुद को खुद से छलता पानी.....

जब भी रंग बदलता पानी.
खुद को खुद से छलता पानी.


पृथ्वी का अनमोल खज़ाना,
उगती फसलें-चलता पानी.


कहीं त्रासदी-कहीं ज़िन्दगी,
मीलों-मील उछलता पानी.


दुनिया भर ऐसे पसमंज़र,
भूखे पेट-उबलता पानी.


उस की मर्जी दे या ना दे,
आंखें और छलकता पानी.
- योगेन्द्र मौदगिल


30 comments:

M VERMA said...

कही त्रासदी-कही जिन्दगी

पानी के माध्यम से आपने जिन्दगी को उसके यथारूप मे पिरोया है
बहुत सुन्दर

Arvind Mishra said...

पानी से जुड़े सरोकारों पर श्रेष्ठ रचना और मानवीय जिन्दगी की व्यंजना भी

राजीव तनेजा said...

सरल शब्दों में इतनी गूढ बात कैसे कह देते हैँ आप?...सुन्दर रचना

हिमांशु । Himanshu said...

पानी की चहुँओर व्याप्ति और उसके बहुआयामी स्वरूप का उत्कृष्ट सन्दर्भ ।

सहज व बेहद प्रभावशाली रचना । आभार ।

श्यामल सुमन said...

क्या बात है मौदगिल भाई? बहुत खूब लिखा है आपने। जरा इसे भी देखें जो आपको पढ़कर तात्कालिक रूप से बन पड़े हैं -

पानी कम प्रायः आँखों में
क्यों आँखों से बहता पानी?

पानी पानी सुमन सोचकर
पीने को न मिलता पानी

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

मनोज कुमार said...

नई विचारोत्तेजक बात।

डॉ टी एस दराल said...

पानी में जिंदगी का फलसफा सुना दिया ।
उत्तम।

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

बहुत सुन्‍दर चित्रण. धन्‍यवाद.

ललित शर्मा said...

योगेन्द्र जी राम-राम, मन्ने तो सुण्या था के आंखां मे पाणी होणा चाहिये फ़ेर किसी पाणी की जरुरत कोनी, जोर दार बात कही आपने,

चंदन कुमार झा said...

क्या क्या रंग है धरता पानी
पानी तू है कैसा पानी ।


सुन्दर !!!!!!!

अजय कुमार said...

पानी की विशेषतायें अदभुत तरीके से बयां हुईं

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत प्रभावशाली रचना.

रामराम.

महफूज़ अली said...

पानी के ज़रिये आपने बहुत गूढ़ बात कही .....

बहुत अच्छी लगी यह रचना....

आभार.

निर्मला कपिला said...

बहुत सुन्दर पानी की सम्पूरण गाथा । धन्यवाद

पी.सी.गोदियाल said...

बहुत सुन्दर !

परमजीत बाली said...

बहुत बढ़िया व सुन्दर रचना!!

योगेश स्वप्न said...

bahut sunder maudgil ji hamesha ki tarah.

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

वाह्! मौगदिल जी, पानी के माध्यम से जीवन का यथार्थ चित्रण करती हुई बेमिसाल रचना.....

राज भाटिय़ा said...

वाह आप ने अपनी कविता मै पानी के अलग अलग रुप दे दिये, बहुत सुंदर, धन्यवाद

Mrs. Asha Joglekar said...

उसकी मर्जी दे या ना दे
आंखें और छलकता पानी ।
बहुत ही खूबसूरत ।

दिगम्बर नासवा said...

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा ......... पानी के इर्द गिर्द बुना ताना बाना लाजवाब है ........

सुलभ सतरंगी said...

आपने अपने अंदाज़ में पानी और संवेदनाओं को दिखाया है.

ग़ज़ल हमे बहुत अच्छी लगी..

- सुलभ

खुशदीप सहगल said...

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा
जिसमें मिला दो लगे उस जैसा
भूखे की भूख और प्यास जैसा

जय हिंद...

A_N_Nanda said...

आंसू बहता पानी भी तो है भई, पर गर्म है
सब कुछ पानी से साफ़ हो, यह तेरा भरम है
एक दिन सब सुख जाए तो करना क्या है
एक दिन सब को मरना है तो अब करना क्या है।

Thank you Yogendra bhai, thank u for visiting my blog.

Nanda
http://ramblingnanda.blogspot.com

निर्झर'नीर said...

satya ko shabd mein piroya hai aapne bahut khoobsurti ke sath ..

sundar

Ravi Rajbhar said...

Bahut sunder sandesh....

राकेश 'सोहम' said...

यूँ तो आपके नाम से परिचित हूँ लेकिन आपके ब्लॉग पर पहली बार आया हूँ .

आपने हमारे ब्लॉग 'सोऽहं साहित्य सरोवर' पर मेरी रचना को आशीर्वाद दिया इसके लिए आभार.

उसकी मर्ज़ी दे या न दे,
आँखों और छलकता पानी .

एक सशक्त ग़ज़ल से रु-बा-रु हुआ हूँ.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

वाह वाह वाह वाह

अल्पना वर्मा said...

वाह!
हर शेर लाजवाब है.
पानी पर इतनी सुंदर ग़ज़ल!वाह!

विनोद कुमार पांडेय said...

पानी की कहानी,आप के ज़ुबानी और वो भी इतने बेहतरीन लफ़्ज़ों में बहुत अच्छा लगा..धन्यवाद