मुझको तोड़ देती है घर में घर की खामोशी.......

अनुपस्थिति थोड़ी लंबी हो गयी.
कुछ विचित्र सी व्यस्तताएं रही इस बार. खाली होने के बावजूद टाइम की शार्टेज़ रही. खैर.... ज्यादा तो नहीं कुछेक ब्लाग्स पर जाना हो पाया. जिनमें एक ब्लाग पंकज सुबीर जी का भी है. इस बार के तरही के समापन वाली किश्त से पूर्व ग़ज़ल सुनते या पढ़ते ही चरबा उतारने के जिन माहिर मदारियों की बात हुई वह लगभग सत्य है. यही कारण है कि मैं भी अधिकतर अपनी प्रकाशित ग़ज़लें ही ब्लाग पर डालता हूं फिर भी यदा-कदा नई रचनाएं भी डल जाती हैं जैसे आज...
सुबीर जी का इस बात के लिये वंदन करता हूं कि उन्होंने यह बात बड़े सलीके से उठाई. सभी ग़ज़लकारों को उनका समर्थन करना चाहिये.
बहरहाल सुबीर जी के ब्लाग पर तरही के समापन की प्रसन्नता में कुछ शेर इधर पेश कर रहा हूं.

और हां एक बात बताना भूल गया कि इन दिनों शायद आप सब ने नोटिस किया हो कि मेरे ब्लाग की काया पलट हो गयी है. पहले से बेहतर दिखने लगा है तो मैं आप सब को बता दूं कि ये सब कायापलट विनय प्रजापति ने किया है. इस की बधाई उन्हें दें और मेरी ग़ज़ल पर अपनी प्रतिक्रिया मुझे दें.....


सांस-सांस घुलती है हमसफ़र की खामोशी
सुबहो जाग उठती है रात-भर की खामोशी

मिल के दर पे ताला है और घर भी काट रहा
ठण्डे चूल्हे जैसी है अब हुनर की खामोशी

खून सने रस्तों पर दृश्य है मसानों का
साफ कह रही है ये दर-ब-दर की खामोशी

जब से अपने हाथों को खुद पे उठते देखा है
जम गई है होठों पर दुनिया भर की खामोशी

पार तो उतर जाऊं मैं मुश्किलों के सागर से
मुझको तोड़ देती है घर में घर की खामोशी

धुआं-धुआं रस्तों में हर नज़र है सहमी सी
कोई गुल खिलाएगी ये नगर की खामोशी

टहनियों के सीने पर आरियां चली होंगी
खुद में इक गवाही है हर शज़र की खामोशी

उम्र ढलती छाऒं में तोड़ डाले पैमाने
अब बुरी नहीं लगती नाचघर की खामोशी
--योगेन्द्र मौदगिल

26 comments:

रविकांत पाण्डेय said...

बढ़िया है गुरूदेव। ये शेर खास पसंद आये-

मिल के दर पे ताला है और घर भी काट रहा
ठण्डे चूल्हे जैसी है अब हुनर की खामोशी

पार तो उतर जाऊं मैं मुश्किलों के सागर से
मुझको तोड़ देती है घर में घर की खामोशी

बधाई हो।

निरन्तर- महेन्द्र मिश्र said...

सांस-सांस घुलती है हमसफ़र की खामोशी
सुबहो जाग उठती है रात-भर की खामोशी

Bahut hi umda sher hai . jee khush ho gaya . abhaar.

"अर्श" said...

धुआं-धुआं रस्तों में हर नज़र है सहमी सी
कोई गुल खिलाएगी ये नगर की खामोशी

टहनियों के सीने पर आरियां चली होंगी
खुद में इक गवाही है हर शज़र की खामोशी

waah maudgil sahib in do she'ro ke kya kahane .... dheoro badhaayee iske liye .... aur jahaan tak kaayaa palat ki baat hai to uske liye vinay bhaee to ustaad aadmi hai... unke tech prevue se hi pataa chaltaa hai...

aap dono ko hi badhaayee


arsh

Udan Tashtari said...

मिल के दर पे ताला है और घर भी काट रहा
ठण्डे चूल्हे जैसी है अब हुनर की खामोशी

--वाह!! यूँ हर शेर दमदार.

ब्लॉग सुन्दर बन पड़ा है. आपको और विनय जी को बधाई.

●๋• सैयद | Syed ●๋• said...

मिल के दर पे ताला है और घर भी काट रहा
ठण्डे चूल्हे जैसी है अब हुनर की खामोशी...


दमदार शेर...

Harsh said...

gajal padkar dil ko sukoon mila. aapke blog ki kaya achchi ho gayi yah dekhkar bhii kaafi khushi hui..ab blog savar gaya hai.

ajay kumar jha said...

kahaan chup baith gaye the,
hamein bechain kar rahee thee idhar kee khaamoshee...

sundar aur asardaar hameshaa kee tarah.

AlbelaKhatri.com said...

is umda aur behtreen ghazal k liye dili badhaiyan.........
bahut achha laga har ek she'r

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

मौदगिल जी, ब्लाग की तो काया पलट हो ही गई है, आपकी नई तस्वीर देख कर तो लगता है कि आपकी भी काया पलट होती जा रही है।..:)

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

लो जी असली वाली टिप्पणी करना तो भूल ही गए थे..
धुआं-धुआं रस्तों में हर नज़र है सहमी सी
कोई गुल खिलाएगी ये नगर की खामोशी

बहुत ही बढिया......हरेक शेर लाजवाब

दिनेश शर्मा said...

पार तो उतर जाऊं मैं मुश्किलों के सागर से
मुझको तोड़ देती है घर में घर की खामोशी

धुआं-धुआं रस्तों में हर नज़र है सहमी सी
कोई गुल खिलाएगी ये नगर की खामोशी

टहनियों के सीने पर आरियां चली होंगी
खुद में इक गवाही है हर शज़र की खामोशी

क्या बात है ? हर शेर लाजवाब है ।

दिगम्बर नासवा said...

ठीक कहा है गुरु देव.............आपकी बात का समर्थन १६ आने............आपकी लाजवाब नयी ग़ज़ल आपनी सब हद्दों को पार करती है.................... नायाब शेरों का कुल्दास्ता है ये ग़ज़ल

ताऊ रामपुरिया said...

मिल के दर पे ताला है और घर भी काट रहा
ठण्डे चूल्हे जैसी है अब हुनर की खामोशी

घणा जोरदार शेर सै जी. बधाई.

और ब्लाग की ही कायापलट नही मन्नै तो थम भी घणॆ गाबरू नजर आरे हो?:)

रामराम.

SWAPN said...

wah maudgil ji, hamesha ki tarah

har sher behatareen/damdaar, badhai sweekaren.

डॉ. मनोज मिश्र said...

पार तो उतर जाऊं मैं मुश्किलों के सागर से
मुझको तोड़ देती है घर में घर की खामोशी.
बहुत ही उम्दा .

गौतम राजरिशी said...

ब्लौग पृष्ठ सचमुच खूब फब रहा है

और तरही जबरदस्त बनी है, सर!

पंकज सुबीर said...

योंगेद्र जी नमस्‍कार सबसे पहले तो आभार मेरे द्वारा उठाये गये ज्‍वलंत मुद्दे को अपने ब्‍लाग पर समर्थन देने के लिये । दरअसल में गंदगी को साफ करने की जवाबदारी हम सबकी है । राहत इंदौरी का शेर है
मेरे कारोबार में सबने बड़ी इमदाद की
दाद लोगों की, गला मेरा, ग़ज़ल उस्‍ताद की
बस यही एक चलन है जिसने शायरी का सत्‍यानाश किया है । खैर अब लोगों को समझ में आ रहा है । और ये तो बड़ा ही जुलम है कि इस ग़ज़ल को आपने विशिष्‍ट प्रविष्टि के तहत नहीं भेजा हमें कम से कम नये लिखने वालों को इससे सीखने को मिलता । किन्‍तु यहां आकर भी सबने सीखा है । बहुत अच्‍छे शेर अच्‍छी गज़ल़ । ब्‍लाग अब खूब फब रहा है । रविवार की छुट्टी के कारण ब्‍लाग पर देर से आया ।

अल्पना वर्मा said...

टहनियों के सीने पर आरियां चली होंगी
खुद में इक गवाही है हर शज़र की खामोशी

bahut khuub!
bahut umda ghazal.
han blog ka naya kalevar achcha hai..vinay prajapati ji ko bahdaayee.

सुशील कुमार छौक्कर said...

आजकल हमारी हालत भी ऐसी है। समय ही नही निकाल पा रहा ब्लोग की दुनिया के लिए। हमेशा की तरह बेहतरीन ग़ज़ल लिखी है आपने।
पार तो उतर जाऊं मैं मुश्किलों के सागर से
मुझको तोड़ देती है घर में घर की खामोशी

ये शेर दिल को छू गया।

विनय said...

कुछ बधाईयाँ दीं और कुछ बधाइयाँ लीं बहुत अच्छा लगा!

---
चाँद, बादल और शाम

अभिषेक ओझा said...

बहुत बढ़िया !
@ताऊ:मन्नै तो थम भी घणॆ गाबरू नजर आरे हो?:) ha ha !

सतपाल said...

सांस-सांस घुलती है हमसफ़र की खामोशी
सुबहो जाग उठती है रात-भर की खामोशी
bahut sanzeeda aur baRia ghazal..
matla behad khoobsurat aur
टहनियों के सीने पर आरियां चली होंगी
खुद में इक गवाही है हर शज़र की खामोशी
wah!
पार तो उतर जाऊं मैं मुश्किलों के सागर से
मुझको तोड़ देती है घर में घर की खामोशी.
wahwa! hum sab ka sach..

डॉ .अनुराग said...

khamoshi khoob hai sarkaar....ye sher achha laga ...
पार तो उतर जाऊं मैं मुश्किलों के सागर से
मुझको तोड़ देती है घर में घर की खामोशी

मोहन वशिष्‍ठ said...

मौदगिल साहब जी बेहतरीन गजल के साथ आगाज किया है आपने और ब्‍लाग भी सुंदर बना दिया विनय जी ने उनको भी बधाई वैसे मुझे आपका लेआऊट भी थोडा चेंज लग रहा है उसके लिए किसे बधाई दें बताना जरूर

sandhyagupta said...

Har baar ki tarah umda.Badhai.

बवाल said...

ठण्डे चूल्हे जैसी है अब हुनर की खामोशी
और
मुझको तोड़ देती है घर में घर की खामोशी
इन दो मिसरों ने दिल तक जाकर बात कर ली योगी बड्डे आप ही कह सकते हो ये। वाह वाह।