इलाज.............. (लघु कहानी)

नोटः--ऒझा या तांत्रिक को हरियाणा-पंजाब के क्षेत्र में सयाना भी कहा जाता है.



सयाने के एक हाथ में हड्डी थी और दूसरे में सिन्दूर. उसने सिन्दूर में हड्डी डुबोयी सामने रखी मूर्ती पर हड्डी से सिन्दूर लगाया और फिर मूर्ती के सामने रखा दस पैसे का सिक्का उठाया और तख्त के आगे नतमस्तक लाला से बोला- 'ले लाला देवता खुश हैं तेरे पे' लै... ले जा ये सिक्का.... गल्ले में डाल लियो---खजाना है खजाना--भण्डार भरे रहेंगें तेरे--आठ सिद्धी नौ निधियां होंगी तेरे पास--जा ऐश कर--पकड़... खजाना ले

लाला श्रद्धा से बावला हो मूंह बाये सयाने की ऒर देख रहा था. लाला की आंखें चमकने लगी. लाला ने दोनों हाथों से कुरते की झोली बना कर फैला ली. सिक्का औटने के लिये. पर पता नहीं सयाने का निशाना चूक गया या फिर खुशी के गारे लाला की झोली टेढी हो गयी कि सिक्का नीचे गिर गया-सयाने की लाल आंखें ऒर लाल हो गयीं. लाला ने सहम कर सिक्का तुरन्त उठा कर तीन-चार बार माथे से छ़वाया, तीन चार बार चूमा और सीने वाली जेब में डाल कर.. जै महाराज की--जै महाराज की---कहता कहता दोनों हाथों से सयाने की पिण्डलियां दबाने लगा. सयाने का ताव कुछ घटा. लाला ने तुरन्त जेब से मुट्ठी भर कर नोट निकाले सयाने के सामने रखी मूरती पर चढ़ाये और हाथ जोड़ कर आग्या मांगने लगा. सयाने ने अपना दांया हाथ अभय की मुद्रा में उठा लिया और लाला उल्टे मूंह सयाने की कोठरी से बाहर निकल आया. देहलियां चूमता हुआ..

अब उस कोठरीनुमा कमरे में शान्ता के अलावा बस एक अधेड़ सी स्त्री और बची थी. वह स्त्री सयाने के सामने खिसक आई शायद वह पहले भी यहां आती रही होगी क्योंकि सयाना उसे देखते ही मुस्कुरा कर उसका हाल पूछने लगा था. स्त्री ने धीमे शब्दों में सयाने को कुछ कहा जो शान्ता को सुनायी नहीं दिया पर सयाना बात सुनते ही खिलखिलाकर हंसा और जोर से बोला---ठीक कहा था ना मैंने, क्यों-----सब देवता की मर्जी है इमरती बाई, देवता की.... देवता खुश तो दुनिया निहाल.... देवता का आशीष है मेरे पर... मैं जो चाहूं कर सकता हूं... अब तो खुशा है ना तू... पोता होगा पोता... दादी बणेगी तू.... समझी आखिर दो महीने झोंके थे तेरी बहू के इलाज पै....
इमरती बाई झट झुकी. सयाने के गोड हाथ लगाया और बोली सही है बाबा जी, आपकी मेहनत ने ही हमें खुशियां बखशी हैं और एक बड़ा नोट अपने पल्लू से खोल सयाने के सामने रखी मूर्ती पर चढ़ा हाथ जोड़ कर बोली, 'जै महाराज की.. कबूल करो महाराज... अगले इतवार फिर आऊंगी....

'हा-हा-हा-सयाने ने अट्टाहास लगाया. लाल कपड़ में बंधी एक पोथी के नीचे नोट दबाया और तख्त के नीचे पड़े तसले से राख की एक चुटकी उठा कर इमरती बाई की तरफ बढ़ा कर बोला, ले देवता की भभूत ले जा... थोड़ी बहू के माथे पर लगाइयो और थोड़ी उसे खिला दियो. बहू सारी उमर सेवा करेगी तेरी....

यह सब देख शान्ता अभिभूत थी. उसे विश्वास हो चला था कि वह सही जगह आ पहुंची है. उसका मां बनने का सपना यह सयाना पूरा कर सकता है. डाक्टर-फाक्टर तो बेकार हैं सब. राम जाने कम्बख्तों ने कितने ही टेस्ट किये कितने ही चैकप किये, ख्वामखाह यों ही भटकती रही इधर उधर. पहले ही आ जाती यहां तो कब का----------

उसका सुखद ख्याल तभी सयाने की कड़क आवाज से टूट गया. सयाना उसी की ऒर नजरें गड़ाये पूछ रहा था, हां तू बता कैसे आई है...?
शान्ता उठ कर तख्त के करीब आ गई. नीचे फर्श पर सिमटी दरी थोड़ा फैला कर बैठ गई और हाथ जोड़ कर बोली, आप तो महाराज... अन्तर्यामी हैं.... मैं तो दुखियारी हूं महाराज... मुझ पर भी किरपा हो जाए तो...

अनुभवी सयाना ताड़ गया. एक एक शब्द तौलता हुआ बोला तो संतान सुख की आस में है तू क्यों...?

हां महाराज----शान्ता ने सयाने के पैर पकड़ लिये.

सयाने ने एक भरपूर नजर शान्ता के चेहरे पर गढ़ाई. एक तश्तरी से ढके गिलास से तश्तरी उतारी और उठा कर गिलास मूंह से लगा लिया और उसके बसद आंखें मूद ध्यानमग्न हो कर बैठ गया.

लगभग दो-तीन मिनट तक कमरे में सिवाय टेबुलफैन के गरगराने के कुछ आवाज नहीं आई. एकाएक सयाने ने आंखें खोली. तख्त से उठा. दांयी और दीवार में बनी खिड़की की ऒर गया खिड़की खोली, बाहर झांका और फिर खिड़की बन्द कर दी. फिर दरवाजे की ऒर घूमा पर खड़े पैर वापस आ कर तख्त पर पद्मासन में बैठ गया. क्षणभर बाद बोला, 'अच्छा नाम क्या है तेरा..?
शान्ता----
कितने साल हो गये ब्याह को तेरे..?
चार बरस हो जाएंगें इस चैत में---
हूं--खसम क्या करता है तेरा..?
फैक्टरी में सुपरवाइजर है महाराज---
इलाज करवाया कोई..?
हां महाराज---
कहां--डाक्टरों पै..?
हां महाराज, सरकारी और प्रायवेट दोनो पै--
फिर क्या बताया--क्या बणा--?
कुछ नहीं महाराज--
कुछ नहीं क्या-- ?
बोले, आस रखो, धीरज रखो, इन्तजार करो, हो जाएगा पर्र----
पर क्या---करले इन्तजार---
बहोत कर लिया महाराज. पड़ौसिनों, भाभियों, ननदों के बालकों को देखती हूं तो हूक सी उठती है, कलेजा बाहर को निकलता है---
अच्छा---तो बच्चा चाहिये तुझे----?
हां महाराज----
हूं--कह कर सयाना मुस्कुराया और पुनः आंखें मूंद कर बैठ गया.
शान्ता गौर से सयाने का मूंह ताकने लगी. कोई चारेक मिनट के बाद सयाने ने अपनी आंखें खोली. उसकी आंखें लालिमापूर्ण हो सांप जैसी चमक लिये हुए थी. शान्ता की ऒर गौर से कुछ क्षण देखकर सयाना अब की बार पूर्व से धीमे स्वर में बोला... 'सुन ---मैं कोशिश तो कर सकता हूं, बावली... पर है सब देवता की इच्छा...
मेरी बात ध्यान से सुन मेरा इलाज गुप्त रखियो---वरना नाश हो जाएगा------सर्वनाश---
कईं पीढ़ीयों तक कोढ़ फूटेगा---समझी---
अच्छा ये बता---छातियों में खाज होती है तेरे---?
शान्ता सकुचाई पर बोली----कभी कभी महाराज
सयाने ने ठहाका लगाया और कूद कर बोला ----हां--हां--होनी भी चाहिये--क्योंकि सिद्ध है... इससे सिद्ध है कि दूध जरूर उतरेगा तेरे--तू लोरियां जरूर गावेगी----छोरा होगा छोरा----

सच्च महाराज---- शान्ता ने सयाने के पांव पकड़ लिये

पांव छोड़ बावली---चित्त इधर लगा--दरवाजा बन्द कर दे--मेरे को वरदान है वरदान--
बारह-बारह कोस तक बच्चे जन्माये हैं मैंने--हिम्मत कर--तेरा इलाज बिना रुकावट एकान्त में होगा

शान्ता सम्मोहित सी उठ खड़ी हुई लेकिन पांव दरवाजे की ऒर न चले. सयाना फुर्ती से स्वयम् उठा और दरवाजा बन्द कर आया--शान्ता के कंधे पर हाथ रखकर फुसफुसाया-----बावली इलाज करवाने में शर्म नहीं की जाती--समझी--मैं तेरे भले के लिये ही तो-----समझी---धीरज रख--धीरज----तेरी मनोकामना पूरी होगी

जड़ हुई शान्ता की दोनों आंखें बह निकली और बन्द कोठरी में इलाज शुरू हो गया--------------------
--योगेन्द्र मौदगिल

21 comments:

COMMON MAN said...

सही वर्णन किया है आपने, नेता सयाने हैं, आम आदमी शान्तायें.

अभिषेक ओझा said...

अब इस पर क्या कहें... दुःख तो ये है की ऐसे सयाने और शांतायें अभी भी हैं.

ताऊ रामपुरिया said...

समाज में आज भी ऐसा हो रहा है ! क्यूंकि अशिक्षा है ! जब तक अशिक्षा दूर नही होगी ! यहाँ रोज कोई ना कोई सयाना किसी शांता का इलाज करता रहेगा ! बहुत धन्यवाद आपको इस मुद्दे पर लिखने के लिए !

डॉ .अनुराग said...

अजीब बात है न की पुत्र प्राप्ति के लिए ख़ुद स्त्रिया इतनी उतावली होती है ?

mehek said...

sahi kaha bahut si jagah aaj bhi aisa ho raha hai,shiksha na pane ka natija hai ye. bua baji totke par vishwas,kab khatam hoga na jane.kuch padhe likhe bhi es mein fas jate hai.ek achhi ankhein kholti kahani.

"अर्श" said...

हम आज भी विकासशील देश ही है और पता नही विक्सित होने में कितना वक्त लगेगा.
बहोत सारी चीजे है जिसे हमें ख़त्म करना ही पड़ेगा ,अन्धविश्वास उनमेसे एक है ..

आपको बहोत बधाई साहब..

जितेन्द़ भगत said...

अच्‍छी कहानी,
ऐसे तांत्रि‍कों का इलाज होना जरूरी है। आम जनता तो बेचारी बेवकूफ बनती ही रहेगी।

PN Subramanian said...

पढ़ कर आत्म ग्लानि हुई. क्या इसके लिए भी आभार कहना होगा?
नहीं मैं ग़लत सोच रहा था. आभार, उत्प्रेरक के लिए.
http://mallar.wordpress.com

भूतनाथ said...

बहुत आँखे खोलने वाली पोस्ट !

Udan Tashtari said...

सयाने और शांतायें सभी तरफ है..बहुत सटीक!!

Mrs. Asha Joglekar said...

एकदम सही ।

रंजना said...

kya kahen....yah sirf kahani to nahi hai........

राज भाटिय़ा said...

योगेन्दर जी बिलकुल सच लिखा है आप ने यह बाबे साले ऎसे ही होते है,ओर यह सब अनपढ नारिया नही पढी लिखी नारियां भी इन के जाल मे फ़स्ती है, इस लिये इन सालो को जुतियो से पुजा जाये तो ही अच्छा है.
धन्यवाद एक सच्ची बात बताने के लिये

dr. ashok priyaranjan said...

आपने सच िलखा है ।

विनय said...

पद्य से गद्य, बहुत सारी बधाईयाँ, ढेरों साधुवाद!

seema gupta said...

"khanee bhut acchee hai, jo log jhad phunk mey jyada ykeen rkhtyh hain unke ankhe kulenge isko pdh kr..."

regards

PREETI BARTHWAL said...

कितना भी समझालीजिए,..कितनी शान्ता ऐसे सयानों के चंगुल में फंस ही जाती हैं, अंधविश्वास पीछा ही नहीं छोङता।

pallavi trivedi said...

samaj ke sach ko bayaan karti kahani....

योगेन्द्र मौदगिल said...

कहानी मेरा फील्ड नहीं. उसके बावजूद जैसा-कैसा बन पड़ा. आपके समक्ष था.
आपने सराहा..
आप सभी का शुक्रिया...

बवाल said...

कहानी आपकी फील्ड नहीं तो क्या हुआ योगी बड्डे "कहन" तो है ना. हा हा. बहुत अच्छी लगी आपकी ये कहानी सर. आभार.

प्रदीप मानोरिया said...

इस देश की जनता शांता सी शांत है और नेता बन गए बाबा
बहुत यथार्थ