(स्रोत २००४ में प्रकाशित मेरा संग्रह "ज़माना लुच्चों का")
ज़र से मालामाल है दुनिया.
पर दिल से कंगाल है दुनिया..
बूढ़ा बाबा बतलाएगा,
क्यों जी का जंजाल है दुनिया..
रौनक, मेले, होटल, बंगले,
चालू सी टकसाल है दुनिया.
देख पीठ को छुरियां तौले,
बद बदतर बदहाल है दुनिया.
सब हैं सपनों के व्यापारी,
सपनों में खुशहाल है दुनिया.
मिल के मज़दूरों का कहना,
चूल्हा आटा दाल है दुनिया
--योगेन्द्र मौदगिल
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)










6 टिप्पणियाँ:
अच्छी गज़ल है।
मौदगिल जी,
गहराई हर शेर में है..
बूढ़ा बाबा बतलाएगा,
क्यों जी का जंजाल है दुनिया..
सब हैं सपनों के व्यापारी,
सपनों में खुशहाल है दुनिया.
मिल के मज़दूरों का कहना,
चूल्हा आटा दाल है दुनिया
बेहतरीन...
***राजीव रंजन प्रसाद
बहुत उम्दा गज़ल है, बधाई.
बहुत बढ़िया है भाई. बधाई.
शोभा पहली मुलाकात के लिये शुक्रिया राजीव जी समीर जी और मीत जी आपकी प्रेरणा ही मुझसे यह पोस्टिंग्स करवा लेती है इस बहाने एक ऊंगलि से हिन्दी टायपिंग तो सीख ही गया मेरी नयी पांडुलिपि हरियाणा साहित्य अकादमी के तत्वावधान से जून २००८ तक प्रकाशित हो जाएगी आज उसमें से नयी गज़ल पोस्ट करूंगा
शोभा g पहली मुलाकात के लिये शुक्रिया राजीव जी समीर जी और मीत जी आपकी प्रेरणा ही मुझसे यह पोस्टिंग्स करवा लेती है इस बहाने एक ऊंगलि से हिन्दी टायपिंग तो सीख ही गया मेरी नयी पांडुलिपि हरियाणा साहित्य अकादमी के तत्वावधान से जून २००८ तक प्रकाशित हो जाएगी आज उसमें से नयी गज़ल पोस्ट करूंगा
एक टिप्पणी भेजें